मोबाइल-इंटरनेट ने आप को कहां पहुंचा दिया

नवभारत टाइम्स

गाजियाबाद में तीन बच्चियों की मौत ने मोबाइल के बढ़ते नशे को उजागर किया है। बच्चे कोरियन गेम्स के दीवाने होकर भारतीय संस्कृति से चिढ़ने लगे हैं। अभिभावक और स्कूल बच्चों को डिजिटल दुनिया में फंसा रहे हैं। अपनी भाषा और संस्कृति से दूरी बच्चों को अकेलेपन और मानसिक अवसाद की ओर धकेल रही है।

mobile internet addiction deteriorating mental state of children and distance from indian culture
गाजियाबाद में तीन बच्चियों की कोरियन गेम्स के चलते आत्महत्या की दर्दनाक घटना ने समाज को झकझोर दिया है। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट का गंभीर संकेत है। मोबाइल, सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स के बढ़ते नशे ने बच्चों, अभिभावकों और स्कूलों को एक ऐसी दलदल में फंसा दिया है, जहाँ बच्चे सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं। इन बच्चियों ने अपनी मौत से पहले एक माफीनामा छोड़ा है, जिसमें उन्होंने अपनी भारतीय संस्कृति से चिढ़ जाहिर की है। यह घटना दिखाती है कि कैसे तकनीकी सुविधाओं ने हमें अपनी जड़ों से दूर कर दिया है और हमारी परवरिश के तरीके में गंभीर खामियां पैदा कर दी हैं।

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। मोबाइल फोन बच्चों के हाथ में एक ऐसा खिलौना बन गया है, जो उन्हें हर समस्या का समाधान लगता है। चाहे बच्चा रो रहा हो या खाना नहीं खा रहा हो, माँ-बाप तुरंत मोबाइल थमा देते हैं। रेस्तरां में बच्चे की ज़िद को शांत करने का सबसे आसान तरीका मोबाइल है। लेकिन इस सुविधा के पीछे हम अपने बच्चों को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं, इसका अंदाज़ा हमें तब होता है जब ऐसी दर्दनाक घटनाएँ सामने आती हैं। गाजियाबाद की तीन बच्चियों ने कोरियन गेम्स के चक्कर में अपनी जान दे दी। उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा कि वे भारतीय संस्कृति से चिढ़ती थीं। यह बहुत ही खौफनाक बात है।
यह सिर्फ इन तीन बच्चियों की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी पीढ़ी की कहानी है जो अपनी संस्कृति से कट रही है। आज के बच्चे गूगल पर होमवर्क करते हैं, पहली क्लास में ही पीडीएफ का बोझ उठाते हैं, वॉइस नोट से बातें करते हैं और गूगल चैट जीपीटी से जवाब ढूंढते हैं। माँ रसोई में व्यस्त है और बच्चा रो रहा है, तो समाधान है मोबाइल। यह दिखाता है कि कैसे हम बच्चों को सुविधा के नाम पर अकेला छोड़ रहे हैं। टीचर खुश हैं कि डिजिटल लर्निंग हो रही है, माँ-बाप खुश हैं कि बच्चा बिजी है। किसी को इस बात की परवाह नहीं कि उनका बच्चा आखिरी बार कब मैदान में दौड़ा था या दादी-नानी से कहानी कब सुनी थी।

इन बच्चियों की चिट्ठी में भारतीय संस्कृति से चिढ़ की बात बहुत गंभीर है। कहीं न कहीं इसके पीछे समाज में धर्म, मजहब और संस्कृति के नाम पर फैलाई जा रही नफरत भी एक कारण हो सकती है। नई पीढ़ी दिखावा पसंद नहीं करती। हम कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। अपनी मातृभाषाओं की बात ही ले लीजिए। ज्यादातर स्कूलों में बच्चे सात विषय अंग्रेजी में पढ़ते हैं और अपनी मातृभाषा में सिर्फ एक। उत्तर भारत में हिंदी और दक्षिण में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ या मलयालम। अभिभावकों और बच्चों की सोच में भी फर्क आ गया है। ज्यादातर अभिभावक भले ही अंग्रेजी में काम करते हों, पर उनका सोचने का तरीका अभी भी देसी है। वे हिंदी या मातृभाषा में ही सोचते हैं। वहीं, उनके बच्चे ज्यादा अंग्रेजी पढ़ने के कारण उसी भाषा को अपनी समझने लगते हैं और हिंदी से कट जाते हैं। अपनी मातृभाषा से कटना मतलब अपनी संस्कृति और संस्कारों से कटना।

पिछली पीढ़ी हॉलीवुड की दीवानी थी, लेकिन आज की जेन जी जापानी, चीनी और कोरियाई संस्कृति के ज्यादा करीब हो रही है। अभिभावकों, शिक्षकों और पुरानी पीढ़ी को समझ नहीं आता कि ये बच्चे जो शांत और अकेले रहते हैं, उनके दिमाग में क्या चल रहा है। कुछ साल पहले एक मिशनरी स्कूल की बारहवीं की छात्रा ने अपने भाई और माँ की हत्या कर दी थी। बाद में उसने पिता पर खुद के रेप का इल्जाम भी लगाया। बाद में पता चला कि वह एक जापानी नॉवेल से इतनी प्रभावित थी कि वह अपने ही घर वालों को विलेन समझने लगी थी। यह दिखाता है कि अपनी भाषा और अपनी देखरेख से बच्चों को दूर करने का अंजाम क्या हो रहा है।

बच्चा अपनी संस्कृति से तभी जुड़ता है जब हम उसे सबसे पहले अपनी मातृभाषा सिखाते हैं। संस्कृति भाषण देने से नहीं आती। यह साथ बैठने से, हाथ पकड़कर चलने से, कहानियों, किस्से-कहानियों, तीज-त्योहारों में साथ जुड़ने से और आमने-सामने के झगड़ों और मेल-मिलाप से आती है। इन तीन बच्चियों का दुनिया से चले जाना सिर्फ आत्महत्या नहीं है। यह हमारी सामूहिक लापरवाही और गलत परवरिश का नतीजा है। यह उस परवरिश का हर्जाना है जिसमें सुविधा तो है, लेकिन समय नहीं। स्क्रीन तो है, लेकिन स्पर्श नहीं। अंग्रेजी तो है, लेकिन अपनी मातृभाषा नहीं।

यह समय नई पीढ़ी को दोष देने का नहीं है। सच तो यह है कि हमने ही नई पीढ़ी को ऑफलाइन से ऑनलाइन किया है और अपनी भाषा-संस्कृति को बाजार में बेच दिया है। स्कूलों को भी यह समझना होगा कि बच्चा इंसान है, रिजल्टशीट नहीं। और अभिभावक सिर्फ ग्राहक नहीं हैं। बच्चों को मोबाइल वाले होमवर्क की नहीं, बल्कि पुरानी डायरी और कॉपी-किताबों की जरूरत है।

आखिर में, इन बच्चियों के परिवार के लिए सदा अंबालवी का यह शेर बहुत सटीक बैठता है:
"वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम तो नहीं बन सकता
दर्द कुछ होते हैं ता-उम्र रुलाने वाले"

यह घटना हमें सिखाती है कि हमें अपनी जड़ों से जुड़ना होगा। हमें बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कार और संस्कृति भी देनी होगी। हमें उनके साथ समय बिताना होगा, उनसे बातें करनी होंगी और उन्हें अपनी भाषा और अपनी संस्कृति से जोड़ना होगा। तभी हम ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोक पाएंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य दे पाएंगे। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। हमें इसे गंभीरता से लेना होगा।

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