अभिनेता पंकज त्रिपाठी और उनकी पत्नी मृदुला ने 'रूपकथा' रंगमंच की शुरुआत की है। यह पहल थियेटर को एक रिटर्न गिफ्ट है। इसका उद्देश्य मोबाइल युग में लोगों को जीवंत कला से जोड़ना है। यह कलाकारों को सशक्त बनाएगा और दर्शकों को कुछ सिखाएगा। पहली प्रस्तुति 'लाइलाज' मनोरंजक और शिक्षाप्रद है। यह मंचन देश भर में होगा।
रंगमंच की दुनिया से निकलकर रुपहले पर्दे पर अपनी खास पहचान बनाने वाले मशहूर अभिनेता पंकज त्रिपाठी और उनकी पत्नी मृदुला त्रिपाठी ने मिलकर 'रूपकथा' नाम से एक नए रंगमंच की शुरुआत की है। थियेटर को अपनी जिंदगी का सब कुछ मानने वाली मृदुला का कहना है कि रंगमंच ने उन्हें सब कुछ दिया है, इसलिए यह उनकी तरफ से एक 'रिटर्न गिफ्ट' जैसा है। कभी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिका रहीं मृदुला की भूमिका अब थोड़ी बदल गई है, और वह अब कलाकारों के व्यक्तित्व को निखारने का काम कर रही हैं। उन्होंने हाल ही में आलोक गागड़ेकर के साथ अपनी बातचीत में 'रूपकथा' रंगमंच की शुरुआत, उसके उद्देश्यों और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया।
'रूपकथा' रंगमंच का विचार पंकज और मृदुला दोनों का था। उनकी जिंदगी की शुरुआत ही रंगमंच से हुई थी, और उनके प्यार की नींव भी रंगमंच पर ही पड़ी थी। इस विचार में साहित्य का भी गहरा योगदान है, जिसमें रेणु जी की कहानियां और 'राग दरबारी' जैसे उपन्यास शामिल हैं। मुंबई आने से पहले वे दिल्ली, पटना और कलकत्ता में रहे, जहाँ उनके पास रंगमंच ही उनका सहारा था। आज बड़े पर्दे पर जो पहचान मिली है, वह उसी रंगमंच की देन है। पंकज के अभिनय से लोग खुश हैं और उनके अभिनय में आज भी रंगमंच की महक महसूस होती है। मृदुला का मानना है कि जब रंगमंच ने उन्हें इतना कुछ दिया है, तो उनका भी यह फर्ज बनता है कि वे भी रंगमंच के लिए कुछ करें। यह 'रूपकथा' रंगमंच उनकी तरफ से थियेटर को एक 'रिटर्न गिफ्ट' है। मुंबई जैसे शहर का अपना एक अलग रंग है, और इस भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ लोग मोबाइल और सोशल मीडिया में खोए रहते हैं, 'रूपकथा' की कोशिश है कि लोग जीवंत कला का अनुभव करें। उनका एक मुख्य उद्देश्य हिंदी दर्शकों का एक नया वर्ग तैयार करना भी है, जो रंगमंच की अहमियत को समझ सके।मृदुला त्रिपाठी, जो खुद एक शिक्षिका रह चुकी हैं, एक शिक्षक और एक फिल्म निर्माता की भूमिका में कोई अंतर नहीं देखतीं। जब वह स्कूल में पढ़ाती थीं, तब उनका मुख्य काम विद्यार्थियों को संस्कार सिखाना था। आज भी वह वही काम कर रही हैं, लेकिन अब उनके साथ कलाकार हैं। स्कूल में भी उनका जोर व्यक्तित्व निर्माण पर था, और आज भी यही उनका लक्ष्य है। अब उनका मकसद रंगमंच को दोनों पक्षों के लिए उपयोगी बनाना है। पहला, जो कलाकार रंगमंच से जुड़े हैं, वे सशक्त बनें, उन्हें रोजगार मिले और वे अपने सपनों को पंख दे सकें। दूसरा, जो लोग रंगमंच देखने आते हैं, वे कुछ न कुछ सीख कर जाएं और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आए।
'रूपकथा' रंगमंच की पहली प्रस्तुति 'लाइलाज' है, जो काफी मनोरंजक और शिक्षाप्रद है। इस नाटक में संगीत, हास्य और कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं जो समाज के लिए बहुत जरूरी हैं। इसे देखने के बाद दर्शकों को कवि आलोक धन्वा की प्रसिद्ध कविता ‘भागी हुई लड़कियां’ की याद आ सकती है। यह नाटक यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब कोई लड़की घर से भागती है, तो जरूरी नहीं कि वह किसी लड़के के साथ ही भागी हो। हो सकता है कि वह अपने सपनों के साथ भागी हो, या फिर वह खुद के साथ ही भाग रही हो, अपने अस्तित्व की तलाश में। इस नाटक को फैज मोहम्मद ने लिखा है और उन्होंने ही इसका निर्देशन भी किया है। इस प्रस्तुति को देखकर पंकज त्रिपाठी इतने प्रेरित हुए कि अब वह भी इसमें एक किरदार निभाने जा रहे हैं। मृदुला को इस बात की खुशी है कि पंकज अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद इसके लिए समय निकाल रहे हैं।
आगे की योजनाओं के बारे में बात करते हुए मृदुला बताती हैं कि फिलहाल 'लाइलाज' के शो मुंबई में हो रहे हैं। इसके बाद वे इस साल भारत रंग महोत्सव में भी इसका मंचन करेंगे। यह एक सुखद संयोग है कि उसी महोत्सव में उनकी बेटी आशी का भी एक और नाटक प्रस्तुत होने वाला है, जिससे आशी बहुत खुश है। इसके बाद 'रूपकथा' रंगमंच कोलकाता, पुणे, अहमदाबाद और भोपाल जैसे शहरों में भी अपने शो प्रस्तुत करेगा। उनका यह मंच सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वे इसे पूरे देश में ले जाने की योजना बना रहे हैं। इसलिए, देश के अधिकतर शहरों में प्रस्तुति देकर वे सभी को इस मंच से जोड़ना चाहते हैं। इसके अलावा, वे एक और बड़ी योजना पर काम कर रहे हैं: 'रूपकथा' रंगमंच का अपना एक स्थायी स्थान होगा, जहाँ कलाकार अपनी कला को और बेहतर बना सकेंगे और उसे निखार सकेंगे।
उनकी बेटी आशी भी 'रूपकथा' रंगमंच में अभिनय कर रही है। आजकल अभिनय सिखाने के लिए कई बड़े संस्थान मौजूद हैं, लेकिन मृदुला और पंकज ने थियेटर को ही क्यों चुना, इस सवाल पर मृदुला का कहना है कि अभिनय आशी की अपनी पसंद है। जब उन्हें इस बारे में पता चला, तो उन्होंने बस उसे अच्छे रंग संस्कार देने की कोशिश की। वे उसे सिर्फ रास्ता दिखा रहे हैं, और थियेटर अपने आप में एक दर्शन है। जो भी यहाँ रच-बस जाएगा, वह सब कुछ सीख जाएगा। थियेटर में आशी न सिर्फ अभिनय सीखेगी, बल्कि एक अच्छी इंसान भी बन जाएगी। मृदुला के पास इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे मानती हैं कि महंगे संसाधन जैसी कोई चीज नहीं होती। अभिनय का असली संसाधन सिर्फ एक है, और वह है अभिनेता या अभिनेत्री का व्यक्तित्व। मृदुला और पंकज की यही आशा है कि आशी अपने सपनों के साथ खुलकर जिए और उन्हें पूरा करे।