Parliamentary Stalemate Readers Opinion On Government opposition Uproar
रीडर्स मेल
नवभारत टाइम्स•
संसद का एक और दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती कटुता के कारण हंगामे में बीता। दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप से संसदीय गरिमा प्रभावित हुई। जनता के मुद्दों पर सार्थक बहस की कमी खल रही है। अमेरिका और अन्य देशों के साथ महत्वपूर्ण कूटनीतिक और व्यापारिक समझौते हो रहे हैं। इन पर सदन में चर्चा आवश्यक है।
संसद का बजट सत्र सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती कड़वाहट के कारण हंगामे की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि देश को अमेरिका और अन्य देशों के साथ महत्वपूर्ण कूटनीतिक और व्यापारिक समझौते करने हैं। ऐसे में सार्थक बहस की कमी से सरकार को देश के लिए आगे की रणनीति बनाने और संतुलित फैसले लेने में मुश्किल हो रही है। जनता अपने प्रतिनिधियों को मुद्दों पर आवाज उठाने के लिए चुनती है, लेकिन वे हंगामे और विरोध-प्रदर्शन में उलझे हुए हैं। अमेरिका के साथ हुए समझौते पर भी कुछ स्पष्टता की आवश्यकता है, जिस पर सदन में चर्चा नहीं हो पा रही है।
संसद का एक और दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती कटुता के कारण हंगामे में बीत गया। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। यह आरोप-प्रत्यारोप तभी तक ठीक है जब तक वे संसद की गरिमा बनाए रखते हुए अपनी शक्ति का सही इस्तेमाल करें। दोनों पक्ष आपस में बात करके सम्मानजनक तरीके से कोई बीच का रास्ता निकाल सकते हैं। इस सत्र में सार्थक बहस होना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत इस समय अमेरिका और अन्य देशों के साथ कई कूटनीतिक और व्यापारिक समझौते कर रहा है। इन समझौतों से ही सरकार को देश के लिए आगे की योजना बनाने और सोच-समझकर फैसले लेने में मदद मिलेगी।6 फरवरी के संपादकीय 'सार्थक बहस हो' पर प्रतिक्रिया देते हुए एक पाठक ने लिखा है कि संसद का यह बजट सत्र भी हंगामे की वजह से बर्बाद होता दिख रहा है। सरकार और विपक्ष के बीच तीखी टिप्पणियां, हंगामा और कड़वे शब्दों का इस्तेमाल संसदीय नियमों और मर्यादाओं को ठेस पहुंचा रहा है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर सदन में भेजती है ताकि उनके मुद्दों को उठाया जा सके। हर चुने हुए प्रतिनिधि को यह बात अच्छे से समझनी चाहिए। लेकिन वे तो हंगामे और विरोध-प्रदर्शन में ही उलझे हुए हैं।
इस समय देश के सामने कई बड़े मुद्दे हैं। अमेरिका के साथ एक समझौता हुआ है, लेकिन कुछ बातों पर अभी भी स्पष्टता की जरूरत है। इस पर सदन में कोई बात ही नहीं हो रही है। जो सवाल सदन के बाहर पूछे जा रहे हैं, उन पर सदन के अंदर चर्चा क्यों नहीं हो सकती? सरकार और विपक्ष, दोनों को मिलकर इस गतिरोध को दूर करना चाहिए। यह समय एक-दूसरे पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि देशहित में मिलकर काम करने का है।
सार्थक बहस के बिना, देश महत्वपूर्ण फैसलों से चूक सकता है। जनता की उम्मीदें अधूरी रह जाती हैं जब उनके चुने हुए प्रतिनिधि सदन में मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय हंगामा करते हैं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है जिस पर सभी को ध्यान देने की आवश्यकता है।