Threat To Indian Constitution And Democracy From Religion caste Politics An Analysis
ख़तरा है धर्म-जाति की सियासत से
Contributed by: सुधांशु रंजन|नवभारत टाइम्स•
भारत का लोकतंत्र और संविधान सुरक्षित है। धर्म-जाति की राजनीति देश के लिए खतरा है। भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। चुनाव आयोग की मतदाता सूची में पुनरीक्षण पर विवाद है। मिली-जुली सरकारों से संवैधानिक संस्थाएं मजबूत होती हैं। एक दल की सरकारें संस्थाओं का सम्मान नहीं करतीं।
आजकल देश में संविधान पर खतरे की बात जोर-शोर से उठाई जा रही है। ऐसे में यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि भारत आज़ादी के महज़ ढाई साल में ही गणतंत्र बन गया था, जबकि उसी समय आज़ाद हुआ पाकिस्तान 23 मार्च 1956 को गणतंत्र बना। यानी पाकिस्तान लगभग 9 साल तक डोमिनियन रहा और उसके बाद भी उसके लोकतंत्र का गला घोंटा जाता रहा। उस दौर में आज़ाद हुए कई देशों का यही हाल हुआ। इसलिए यह भारत के लिए गर्व की बात है कि हमारा लोकतंत्र और संविधान, तमाम मुश्किलों और उतार-चढ़ावों के बावजूद आज भी सुरक्षित है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि एक अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में संविधानों की औसत उम्र महज़ नौ साल होती है।
भारतीय संविधान की रचना को लेकर ग्रैंविल ऑस्टिन ने कहा था कि 1787 में फिलाडेल्फिया में अमेरिकी संविधान बनने के बाद यह सबसे बड़ा राजनीतिक काम था। उनके अनुसार, किसी भी संविधान की असली परीक्षा यह होती है कि वह उन परिस्थितियों से निपटने में कितना कामयाब है, जिन्हें ध्यान में रखकर उसे बनाया गया था। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद भारत में सत्ता का हस्तांतरण जिस शांतिपूर्ण तरीके से हुआ, उससे यह साफ हो जाता है कि भारतीय संविधान सफल रहा है।जब संविधान लागू हुआ, तब मशहूर राजनीतिशास्त्री आइवर जेनिंग्स भारत आए थे। उन्होंने भारत के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में भाषण देते हुए भारतीय संविधान की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह संविधान अपने ही बोझ तले दबकर जल्द ही खत्म हो जाएगा। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय बाद सिलोन (आज का श्रीलंका) ने उन्हें अपने देश का संविधान लिखने के लिए बुलाया। उन्होंने जो संविधान लिखा, वह महज़ छह साल में ही दम तोड़ गया। इसके विपरीत, भारतीय संविधान आज भी पूरी तरह जीवंत है।
आज के दौर में सांप्रदायिकता और जातिवाद को वैचारिक स्तर पर बढ़ावा मिल रहा है। अब जातीय जनगणना भी होने जा रही है। राहुल गांधी ने इसके पक्ष में काफी लंबा अभियान चलाया था। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि इसी कांग्रेस पार्टी ने 1955 में नई दिल्ली में हुए अपने 60वें सत्र में एक प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि हर ऐसी प्रवृत्ति को कुचलना होगा जो अलगाववाद को बढ़ावा देती है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि जातिवाद अलगाववादी होने के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरा है।
इससे भी पहले, 16 जुलाई और 1 अगस्त 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को देश की एकता के लिए खतरा पैदा करने वाली ताकतों के बारे में पत्र लिखे थे। उन्होंने बताया था कि प्रांतीय भावनाएं, सांप्रदायिक भावनाएं, जातीय भावनाएं और भाषाई भावनाएं देश की एकता को तोड़ सकती हैं। उस समय के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1960 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने संबोधन में कहा था कि इन सभी भावनाओं को राष्ट्रीय भावना के अधीन होना चाहिए।
अभी चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर काफी विवाद चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह SIR विरोधी दलों के समर्थकों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए किया जा रहा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, लेकिन कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने पहचान के लिए कुछ अन्य दस्तावेजों को शामिल करने का निर्देश ज़रूर दिया। जाहिर है, मतदाता सूची का पुनरीक्षण तो होना ही चाहिए, लेकिन यह पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए।
भ्रष्टाचार देश के लिए शुरू से ही एक बड़ी चुनौती रहा है। सितंबर 1946 में जब अंतरिम सरकार बनी थी, तब महात्मा गांधी को रोज़ाना औसतन अस्सी चिट्ठियां भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर आती थीं। 1948 में ही जीप घोटाला हुआ था, जिसमें ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी के कृष्ण मेनन पर आरोप लगे थे। जब एक सांसद ने भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठाया, तो नेहरू ने कहा था कि माननीय सदस्य को इधर-उधर की 'लिटिल करप्शन' (थोड़े भ्रष्टाचार) की चर्चा नहीं करनी चाहिए। इस पर उस सांसद ने टिप्पणी की थी कि 'लिटिल करप्शन' 'लिटिल प्रेग्नेंसी' (थोड़ी सी गर्भावस्था) की तरह है, जो समय के साथ बढ़ता ही जाएगा। यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और भ्रष्टाचार आज देश की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
भारतीय लोकतंत्र का एक और अनुभव यह रहा है कि जब मिली-जुली सरकारें बनती हैं, तो विकास थोड़ा धीमा हो सकता है। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि ऐसी सरकारों से संवैधानिक संस्थाएं मजबूत होती हैं। इसके विपरीत, एक दल की सरकार, चाहे वह केंद्र में हो या राज्य में, अक्सर दूसरी संस्थाओं का सम्मान नहीं करती है। इससे कैबिनेट सिस्टम भी कमजोर हो जाता है और केवल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की ही चलती रह जाती है। ऐसा नहीं होना चाहिए।