जन्मदर में सिक्किम का हाल जापान से बुरा

नवभारत टाइम्स

भारत में जन्मदर चिंता का विषय है। सिक्किम में स्थिति जापान से भी खराब है। यहाँ बच्चे कम पैदा हो रहे हैं। सरकारें जन्मदर बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चला रही हैं। सिंगापुर, दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। हंगरी ने कुछ हद तक सफलता पाई है।

sikkims birth rate worse than japans indias population on the verge of aging
देश में घटती फर्टिलिटी दर चिंता का विषय बन गई है, जिसका सीधा असर 2050 तक भारत की आबादी के बूढ़ा होने पर पड़ेगा। अनुमान है कि तब 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या कुल आबादी का करीब 20% हो जाएगी। आजादी के 100वें साल तक तो हालात ऐसे हो सकते हैं कि देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे। इस समस्या से सबसे ज्यादा जूझ रहा है सिक्किम, जहां जापान से भी कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। सरकार पिछले चार साल से कोशिश कर रही है, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं दिख रहा। पूरे देश का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) यानी औसतन एक महिला द्वारा जन्म दिए जाने वाले बच्चों की संख्या, जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए 2.1 होनी चाहिए, लेकिन भारत में यह 1.9 से 2.0 के बीच है। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के अनुसार, सिक्किम का TFR 2025-26 तक 1.1 हो गया है, जो कि चिंताजनक है। 2005-06 में यह 2.0 था, जो 2015-16 में घटकर 1.2 हो गया था।

सिक्किम सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। 2022 में 'वात्सल्य योजना' शुरू की गई, जिसका मकसद उन जोड़ों की मदद करना था जिन्हें गर्भधारण करने में परेशानी हो रही थी। इस योजना के तहत, इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) जैसे महंगे इलाज के लिए हर जोड़े को 3 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी गई। इस योजना का शुरुआती असर दिखा, क्योंकि 38 महिलाओं ने रजिस्ट्रेशन कराया। इससे यह भी पता चला कि प्रेग्नेंसी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं भी कम TFR का एक कारण हो सकती हैं।
बच्चों के जन्म को बढ़ावा देने के लिए सिक्किम ने सरकारी कर्मचारियों के लिए भी खास नियम बनाए। जनवरी 2023 से लागू हुए इन नियमों के तहत, सरकारी कर्मचारियों के वेतन वृद्धि को बच्चों के जन्म से जोड़ा गया। दूसरा बच्चा होने पर कर्मचारियों का वेतन एक बार बढ़ाया गया, और तीसरे बच्चे पर दो बार वेतन वृद्धि का लाभ मिला। महिला कर्मचारियों के लिए मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) को एक साल कर दिया गया और पुरुष कर्मचारियों को पैटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश) दी गई। सरकारी कर्मचारियों के बच्चों की देखभाल के लिए सरकार ने अटेंडेंट (देखभाल करने वाले) भी रखे। निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए भी एक खास प्रावधान किया गया। दूसरा बच्चा होने पर उन्हें एक साल तक हर महीने 5,000 रुपये और तीसरा बच्चा होने पर 10,000 रुपये देने की व्यवस्था की गई।

हालांकि, इन सब प्रयासों का बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। अब सिक्किम सरकार नैशनल रिसर्च इंस्टीट्यूशन के साथ मिलकर यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर फर्टिलिटी रेट क्यों कम हो रहा है। सिक्किम जैसी स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों में भी ऐसी ही समस्या है। इन देशों ने भी जन्म दर बढ़ाने के लिए तरह-तरह के लाभ दिए, लेकिन खास सफलता नहीं मिली।

सिंगापुर का TFR लगभग 1.0 के आसपास है। वहां सरकार दशकों से बेबी बोनस, टैक्स में छूट, सस्ती चाइल्ड केयर (बच्चों की देखभाल) और हाउसिंग इन्सेंटिव (आवास प्रोत्साहन) जैसी योजनाएं चला रही है। इसके बावजूद, जन्म दर बहुत कम बनी हुई है। दक्षिण कोरिया की स्थिति तो और भी गंभीर है। वहां 2023-24 में TFR लगभग 0.7 तक गिर गया। सरकार ने बच्चों के लिए नकद सहायता, चाइल्ड केयर सब्सिडी और लंबी पेरेंटल लीव (माता-पिता के लिए लंबी छुट्टी) जैसी योजनाओं पर भारी भरकम खर्च किया है, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखा। जापान का TFR 1.3 है।

हालांकि, हंगरी को इस मामले में थोड़ी सफलता मिली है। 2011 में वहां TFR 1.23 था। सरकार ने हाउसिंग सब्सिडी, कम ब्याज पर कर्ज और चार या उससे अधिक बच्चों वाली महिलाओं के लिए आयकर में छूट जैसी नीतियां लागू कीं। इसके 10 साल बाद, वहां TFR बढ़कर 1.5 हो गया। हालांकि, यह आंकड़ा भी जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए जरूरी रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से काफी कम है। यह दिखाता है कि घटती जन्म दर एक वैश्विक समस्या है और इसके समाधान के लिए सरकारों को लगातार नए और प्रभावी तरीके खोजने होंगे।