जब DMK के गढ़ कोलाथुर में स्टालिन के समर्थक आंखों में आंसू लेकर खड़े थे, तब तमिलनाडु की राजनीति का असली बदलाव दिख रहा था। यह सिर्फ एक पार्टी की हार नहीं, 60 साल पुरानी व्यवस्था की हार थी। तमिलनाडु की राजनीति में 2026 का यह चुनाव राजनीतिक संस्कृति के रीसेट का क्षण है।
बदलाव की मांग । 108 सीटें जीतकर विजय की TVK सत्ता की दहलीज पर खड़ी है। यह नतीजा एक रात में लिखी गई पटकथा नहीं, दशकों से तैयार हो रही कहानी का क्लाइमेक्स है। TVK भले ही कागज पर दो साल पुरानी पार्टी लग रही हो, पर विजय की राजनीतिक तैयारियां कम से कम दो दशक पुरानी हैं। उनकी जीत को सिर्फ स्टार पावर कहना उस बदलाव के साथ नाइंसाफी है, जो तमिलनाडु ने मांगा था।
द्रविड़ पॉलिटिक्स । 1967 में पेरियार की विचारधारा और अन्नादुरई के नेतृत्व में जो हिंदी-विरोधी आंदोलन द्रविड़ राजनीति की आधारशिला बना, उसे एमजी रामचंद्रन और एम. करुणानिधि की करिश्माई जोड़ी ने सत्ता तक पहुंचाया। इसके बाद 60 साल तक तमिलनाडु की कुर्सी दो खेमों के बीच ही झूलती रही - DMK और AIADMK। दोनों दल भले टकराते दिखे हों, पर बुनियादी वैचारिक रेखा कमोबेश साझा रही - द्रविड़ आत्मसम्मान, केंद्र के हिंदी और हिंदुत्व आरोपण का विरोध, सामाजिक न्याय।
नई मांग । समस्या यह है कि 1960-70 के दशक की यह भाषा 2026 में मिलेनियल्स, जेन-जी और जेन-अल्फा मतदाताओं के लिए सिर्फ नारा रह गई। नई पीढ़ी को रोजगार, स्टार्टअप, टेक्नॉलजी, ग्लोबल कनेक्टिविटी और अपनी आजादी चाहिए। पुरानी रैलियों की Rhetoric उन्हें बोरिंग बैकग्राउंड नॉइज की तरह लगती है। विजय ने ठीक इसी गैप को भांपा। द्रविड़ राजनीति पर बिना कुछ कहे नई तमिल आकांक्षा के चेहरे के तौर पर सामने आए, जहां तमिल स्वाभिमान और 21वीं सदी का ग्लोबल सपना साथ-साथ चलें।
स्टार पावर । तमिलनाडु में स्टार-वर्शिप सामाजिक विचलन नहीं, सहज-सामाजिक प्रवृत्ति है। एमजीआर और जयललिता सिर्फ मुख्यमंत्री न होकर प्रदेश के लिए गॉड-फीगर थे। करुणानिधि स्क्रिप्ट राइटर थे, पर राजनीति में भी उन्होंने नैरेटिव गढ़ने की कला दिखाई। इन तीनों के जाने के बाद DMK और AIADMK - दोनों में स्टार पावर का वैक्यूम पैदा हुआ। स्टालिन प्रशासक हो सकते हैं, करिश्माई आइकॉन नहीं। AIADMK अंतर्कलह और नेतृत्व विहीनता से जूझती रही।
स्पष्ट अजेंडा । कमल हासन, सीमन, विजयकांत, खुशबू जैसे फिल्मी चेहरे राजनीति में उतरे, पर वे न तो वैचारिक स्पष्टता दे पाए, ना ही संगठनात्मक ताकत गढ़ सके। विजय ने खुद को अलग ढंग से पेश किया। उनकी लार्जर देन लाइफ इमेज पहले से तैयार थी, लेकिन उन्होंने उसे सिर्फ स्टारडम तक सीमित नहीं रखा। वह लगातार एक स्पष्ट पॉलिटिकल आइडियोलॉजी और अजेंडा दोहराते रहे कि जीते तो क्या करेंगे, किस तरह का सुशासन देंगे, युवा, रोजगार, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, शिक्षा और हेल्थ पर उनका क्या विजन है।
तीसरा विकल्प । एक समय BJP ने विजय की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था, पर उन्होंने मना कर दिया। यह DMK के हिंदुत्व-विरोधी वोट बैंक में सीधी सेंधमारी थी। जो मतदाता BJP विरोधी थे और जिन्हें DMK के भ्रष्टाचार, वंशवाद या सनातन-विरोधी बयानबाजी से असहमति थी, उनके लिए TVK एक आकर्षक विकल्प बन गया।
बयानों से नाराजगी । तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के दबदबे का यह अर्थ कभी नहीं रहा कि सनातन परंपराएं खत्म हो गईं। अय्यर-अय्यंगर जैसे प्रभावशाली ब्राह्मण समुदाय, बड़े मंदिर, विवाह-उपनयन जैसे संस्कार, संगमकालीन प्रतीक - ये सब आज भी समाज में मौजूद हैं। जब DMK सरकार के मंत्री और विशेष रूप से उदयनिधि स्टालिन के सनातन विरोधी बयान आए और उन पर कोई गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो एक बड़े तबके के हिंदू आहत हुए। BJP को वोट देने से तमिल पहचान उन्हें रोकती थी, लेकिन धार्मिक विश्वास पर आघात के कारण DMK भी उनके लिए विकल्प नहीं रह गई।
नया वर्ग । तमिलनाडु में मुस्लिम वोट पर पारंपरिक रूप से DMK और IUML जैसे दलों का प्रभाव रहा है। लेकिन, समय के साथ एक 'नियो वोटर ग्रुप' उभरा है - क्रिश्चियन समुदाय। यह वर्ग आम तौर पर DMK का समर्थक माना जाता था, लेकिन सी. जोसेफ विजय की निजी पहचान, उनके चर्च-कनेक्ट और 'पीड़ित-गरीब-हाशिए के पक्ष' वाली ऑन-स्क्रीन इमेज ने ईसाई मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उनकी तरफ खींचा।
दलितों का साथ । DMK की राजनीति में दलितों का मजबूत आधार शामिल था। लेकिन, पिछले दिनों उनके गढ़ मदुरै जैसे इलाकों से दलितों के उत्पीड़न की खबरें आ रही थीं। मुस्लिम मतदाता भी विजय के साथ आ खड़ा हुआ। मदुरै से जीते उनके विधायक का जीत के बाद हिंदी में मीडिया से बात करना यह संकेत है कि TVK की राजनीति भाषाई या सांप्रदायिक बैरिकेड्स पर नहीं टिकने वाली, उसमें राष्ट्रीय आकांक्षा भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

