मेहनती बच्चे तुझे सलाम

Contributed byक्षमा शर्मा|नवभारतटाइम्स.कॉम

सुबह चार बजे से काम शुरू करने वाला एक युवा अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहा है। वह लोगों के घरों तक जरूरी सामान पहुंचाता है। यह युवा सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा है। अपनी मेहनत और लगन से वह भविष्य में कुछ बड़ा करने का जज्बा रखता है। उसकी यह कहानी प्रेरणादायक है।

inspiring story of a hardworking student working from 4 am after 12th grade

सुबह का मौसम सुहावना था। हवा चल रही थी। सामने पटरियों पर भागती मेट्रो की लाइट्स। मंदिर की घंटियां। आम के पेड़ों के नीचे पड़ी अमियां। गेट पर पहुंची तो देखा कि एक बिल्ली आराम से चूहे का नाश्ता कर रही थी। तभी बाइक का हॉर्न बजा। मैं हट गई, बिल्ली कार के नीचे जा छिपी। अक्सर इस बाइक वाले को आते-जाते देखती हूं। बाइक के आगे-पीछे थैलों में दूध, छाछ की थैलियां, ब्रेड, दही, बिस्कुट, बन, रस्क जैसे कई सामान रहते हैं।

आज जब बाइक बिल्कुल सामने आकर रुकी, तो मैं ठहरकर उसे सामान निकालते देखने लगी। उसने सामने वाले फ्लैट की घंटी बजाई, फिर बाहर आ गया। मैंने उससे पूछा कि कब से यह काम कर रहे हो? उसने बताया 12वीं का इम्तहान देने के बाद से। मैंने पूछा, ‘कितने बजे उठते हो?’ ‘सुबह 4 बजे उठकर सामान इकट्ठा करता हूं। रात को ही लोग बता देते हैं कि सुबह उन्हें क्या चाहिए। उसी लिस्ट के अनुसार मैं सामान लाता हूं और सुबह-सुबह उनके घर पहुंचा देता हूं।’ मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘यहां इतने घर हैं। कहां क्या पहुंचाना है, यह याद कैसे रहता है?’ ‘अब तो कई बरस हो गए। इतने साल से ये काम कर रहा हूं कि अब तो लोगों के घर के सामान ही नहीं, उनकी आवाज भी याद हो गई है।’ कितना कमाते हो? उसने बताया, ‘गुजारा लायक हो जाता है।’ ‘कितने बजे फ्री होते हो?’ ‘बस, यही कोई 6:30 तक।’ ‘फिर क्या करते हो?’ ‘घर चला जाता हूं, अशोक नगर। वहां मां चाय बनाकर रखती है।’

‘यानी बगैर चाय के ही निकल जाते हो?’ ‘हां मैडम, 4 बजे कौन चाय बनाएगा। मैं अगर किचन में जाऊंगा तो सभी की नींद खराब हो जाएगी। एक ही कमरे का तो घर है। फिर मम्मी जो सामान लाने को कहती हैं, ला देता हूं। क्योंकि, इतने पैसे तो हैं नहीं कि महीने का राशन एक साथ खरीद सकूं।’ ‘फिर पापा काम पर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें बाइक से मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूं। कई बार बहन को भी स्कूल छोड़ने जाना पड़ता है। फिर मैं फ्री होकर कॉलेज जाता हूं।’

‘कौन से कॉलेज?’ ‘डीएवी।’ जब उससे पूछा, आगे क्या करना है? तब उसने कहा, ‘करना तो बहुत कुछ चाहता हूं, पर ऊपर वाला जाने, कितना कर पाऊंगा। फिलहाल, सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा हूं।’ फिर वह दूसरे फ्लैट की घंटी बजाता है और मैं आगे बढ़ जाती हूं। उसे देखकर अहसास होता है कि 20-21 बरस का यह लड़का कितना मेहनती है। जिम्मेदारियों के बोझ से दबे होने पर भी निराश नहीं है। पीछे मुड़कर देखा तो वह बाइक स्टार्ट करके जा रहा था। मेरा मन उसे सलाम करने का हुआ।