‘ सैराट ’ और ‘ झुंड ’ जैसी फिल्मों के निर्माता, चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित, हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज निर्देशक-अभिनेता नागराज पोपटराव मंजुले की खास शैली ने उन्हें सिनेमा में अलग पहचान दिलाई है। आलोक गागडेकर ने उनके जीवन, संघर्ष और सिनेमा पर विस्तृत बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश :
n आप वडार समुदाय से आते हैं, जिसके लोग कुशल शिल्पकार होते थे। देश की कई बड़ी इमारतों के निर्माण में उनका योगदान रहा है। बावजूद इसके, उनका जीवन संघर्षपूर्ण ही रहा। ऐसे मुश्किल माहौल में आपका रुझान कला और सिनेमा की ओर कैसे हो गया?
मेरे पिताजी पढ़े-लिखे तो नहीं थे, लेकिन दरियादिल थे। मुझे पढ़ने के लिए कभी नहीं रोका। वह मानते थे कि एक सदस्य भी पढ़ जाएगा तो पूरा परिवार संभल जाएगा। मैंने जेऊर गांव से पुणे तक मराठी भाषा में M.A. और M.Phil की पढ़ाई की। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए नौकरी करनी पड़ी। इसी दौरान मेरे दोस्त गणेश जसवंत ने मुझे मास कम्युनिकेशन करने की सलाह दी। उसी कोर्स को करते हुए ‘पिस्तुल्या’ फिल्म बनाई थी। मैं अक्सर गणेश से कहता था कि वह फिल्म बनाए, लेकिन फिल्म बन मुझसे गई! फिल्मों में आना महज संयोग था। मुंबई में एक प्रॉडक्शन हाउस की नौकरी छोड़कर जब मैं घर लौट रहा था, तब मैंने भाई को फोन लगाया। उसने बताया कि ‘पिस्तुल्या’ को दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। इससे प्रोत्साहित होकर मैंने ‘फेंड्री’ बनाई। इसे भी दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
n फिल्म मेकिंग के लिए आपकी अपनी एक घरेलू टीम रही है। इतना लंबा साथ और तालमेल कैसे बना रहा?
दरअसल, हम पहले एक टीम नहीं, बल्कि दोस्त थे। कॉलेज में ही मुझे प्रियंका, गार्गी, सुधीर जैसे साथी मिले। वहीं हमने अपनी पहली फिल्म बनाई। ऐसा नहीं था कि हम फिल्ममेकर थे इसलिए अच्छे दोस्त बने, बल्कि हम अच्छे दोस्त थे इसलिए अच्छे फिल्ममेकर बन पाए। बाद में अजय, अतुल भी जुड़े। उनसे मेरा भाईचारा 'फैंड्री' से बना जो आज भी कायम है।
n पिछले 25 बरसों में क्या बदला? पीछे मुड़कर देखते हुए क्या महसूस करते हैं?
फिल्में देखने का बहुत शौक था पर पैसों की कमी रहती थी। एक-एक पैसे के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती। कई बार फिल्म देखने चुपके से दीवार फांदकर सिनेमा हॉल में घुस जाते। कभी ऐसी लाचारी थी, आज हम सिनेमा बना रहे हैं। पर जो आनंद सिनेमा देखने में आता था, उतना बनाने में नहीं आता। क्योंकि, पहले निस्वार्थ भाव से सिनेमा देखते थे, आज हम आलोचनात्मक रूप से देखते हैं। जिन अमिताभ बच्चन की फिल्में देखने के लिए चोरी-छुपे दीवार फांदकर जाते थे, उन्हीं को झुंड फिल्म में डायरेक्ट करने का सौभाग्य मिला।
n आपकी फिल्मों के विषय लीक से हटकर होते हैं। कलाकार भी चुनकर लाते हैं। ऐसे लोग आपकी फिल्मों में अच्छा अभिनय कर निकलते हैं, जिन्हें एक्टिंग का खास अनुभव भी नहीं होता। ऐसा कैसे? इस प्रक्रिया में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
मेरी शुरुआत शॉर्ट फिल्मों से हुई थी। उस समय जो कलाकार मिल जाते थे, उनके साथ काम करना पड़ता। मैं कलाकार से ज्यादा किरदार के बारे में सोचता हूं। जो व्यक्ति किरदार के सबसे करीब लगता है, उसे मौका देता हूं, चाहे वह स्टार हो या नया कलाकार। हालांकि मैं पेशेवर कलाकारों के साथ काम करना चाहता हूं। प्रफेशनल अभिनेता किरदार अच्छे से निभा लेते हैं, लेकिन मेरा झुकाव ऐसे लोगों की ओर ज्यादा रहता है जिनके व्यक्तित्व में वह किरदार साफ झलकता हो। साथ ही, अलग-अलग रोल के लिए इतने सारे पेशेवर एक्टर मिलना आसान नहीं होता। इसलिए, मैं ऐसे लोगों को खोजता हूं जो किरदार के करीब हों। ‘फैंड्री’ और ‘झुंड’ में भी ऐसा ही हुआ।
n निर्देशक होने के साथ-साथ आप स्वयं भी एक अभिनेता हैं। फिल्म ‘वैकुंठ’ में आपके अभिनय की काफी सराहना हुई। निर्देशन और अभिनय के बीच सामंजस्य कैसे बना लेते हैं?
दोनों के बीच सामंजस्य आसानी से कायम हो जाता है। दरअसल, निर्देशन के दौरान अभिनेता से जिस भाव को आप प्रकट करवाना चाहते हैं, वह भाव अपने भीतर पहले प्रकट होना चाहिए। इस लिहाज से देखें तो निर्देशन और अभियन में काफी समानता है। वैसे, मुझे निर्देशन अधिक पसंद है और मैं उसी पर अधिक ध्यान देता हूं। साहित्य भी मेरे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण रहा है।
n अब किन प्रॉजेक्ट पर काम कर रहे हैं?
हाल ही में अमेजन प्राइम पर मेरा शो ‘मटका किंग’ रिलीज हुआ है। ‘सैराट’ के बाद मेरी दूसरी निर्देशित मराठी फिल्म ‘खाशाबा’ आने वाली है। यह खाशाबा जाधव की स्पोर्ट्स बायोपिक है, जिन्होंने भारत के लिए ओलिंपिक पदक जीता था।


