दिलीप लाल
दिल्ली, मुंबई में कबूतरों की भरमार है। इनको दाना खिलाने को लेकर विवाद भी हो चुका है। एक हालिया रिसर्च के मुताबिक इंसानों और कबूतरों के बीच का यह रिश्ता हजारों बरस पुराना है, जिसमें दोस्ती के साथ दुश्मनी भी है। कबूतर कभी मानव जीवन, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। शोधकर्ताओं को Hala Sultan Tekke नामक प्राचीन बंदरगाह शहर से कबूतरों की 157 हड्डियां मिलीं। यह स्थान आज साइप्रस का महत्वपूर्ण मुस्लिम तीर्थस्थल माना जाता है। वैज्ञानिकों ने इन हड्डियों में मौजूद नाइट्रोजन और कार्बन तत्वों का अध्ययन किया। इससे पता चला कि इंसानों और कबूतरों का भोजन काफी हद तक समान था- अनाज और सब्जियां। इसका मतलब है कि कबूतर इंसानों के साथ रहते थे और उनके भोजन पर निर्भर थे। कुछ हड्डियों से संकेत मिलता है कि लोग तब भी कबूतरों को पालते और उनका प्रजनन कराते थे। जली हुई हड्डियां भी मिलीं। इससे अनुमान लगाया गया कि धार्मिक अनुष्ठानों और भोज में भी कबूतरों का उपयोग होता था। दरअसल, इंसानों ने ही कबूतरों को दुनिया भर में फैलाया और उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाया। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद कबूतरों की जरूरत खत्म हो गई। अब तो कई शहरों में उनको दाना खिलाने पर भी रोक लगाई जा रही है, क्योंकि इनकी आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है।


