मोरक्को में ईद उल अज़हा कुर्बानी पर रोक: सूखा, महंगाई और पशुधन संकट के कारण
मोरक्को में ईद-उल-अज़हा कुर्बानी पर रोक: सूखा, महंगाई और पशुधन संकट के कारण
NewsPoint•
मोरक्को में इस साल ईद-उल-अज़हा पर धार्मिक कुर्बानी नहीं होगी। देश में लंबे समय से सूखे और बढ़ती महंगाई के कारण यह फैसला लिया गया है। राजा मोहम्मद षष्ठम ने जनता से कुर्बानी से बचने की अपील की है। उन्होंने स्वयं पूरे देश की ओर से प्रतीकात्मक कुर्बानी देने की घोषणा की है।
ईद-उल-अज़हा का त्योहार दुनिया भर में धूमधाम से मनाया जा रहा है, लेकिन मोरक्को ने इस बार धार्मिक कुर्बानी पर रोक लगा दी है। यह फैसला राजा मोहम्मद VI ने 26 फरवरी, 2025 को लिया, जिसका मुख्य कारण देश में लंबे समय से चला आ रहा सूखा, बढ़ती महंगाई और पशुधन क्षेत्र का संकट था। सरकार का मानना था कि इन परिस्थितियों में कुर्बानी से देश पर भारी सामाजिक और आर्थिक बोझ पड़ेगा। राजा ने घोषणा की कि वह पूरे देश की ओर से एक प्रतीकात्मक कुर्बानी देंगे, और आम लोगों से कुर्बानी से बचने की अपील की। इस फैसले के कारण जून 2025 की ईद पर मोरक्को में पारंपरिक कुर्बानी नहीं हुई। यह पहली बार नहीं है जब मोरक्को में कुर्बानी पर रोक लगी है; इससे पहले भी राजा हसन II के शासनकाल में 1963, 1981 और 1996 में ऐसे निर्णय लिए गए थे।
दुनिया भर में मुसलमान ईद-उल-अज़हा का त्योहार मना रहे हैं। बाज़ार सजे हुए हैं और धार्मिक कुर्बानी की तैयारियां चल रही हैं। हर देश अपने तरीके से इस त्योहार को मनाता है। लेकिन मोरक्को एक ऐसा देश है जिसने इस धार्मिक कुर्बानी पर कई बार रोक लगाई है। यह तब और भी खास हो जाता है जब हम जानते हैं कि मोरक्को की लगभग 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। ऐसे में, ईद-उल-अज़हा पर कुर्बानी पर रोक लगाना एक बड़ी बात थी और यह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया।मोरक्को में कुर्बानी पर यह रोक किसी धार्मिक विरोध के कारण नहीं लगाई गई थी। बल्कि, यह एक ज़रूरत का फैसला था। देश गंभीर सूखे से जूझ रहा था। महंगाई भी बहुत बढ़ गई थी और पशुधन क्षेत्र में भी संकट था। सरकार और शाही परिवार, दोनों का मानना था कि ऐसी मुश्किलों में धार्मिक कुर्बानी देने से देश पर एक असहनीय सामाजिक और आर्थिक बोझ पड़ेगा।
मोरक्को में धार्मिक कुर्बानी पर रोक की आधिकारिक घोषणा 26 फरवरी, 2025 को हुई थी। यह घोषणा मोरक्को के राजा मोहम्मद VI की ओर से की गई थी। राजा का संदेश देश के इस्लामी मामलों के मंत्री ने सरकारी टेलीविज़न पर पढ़कर सुनाया। उस समय, यह साफ तौर पर कहा गया था कि आम लोगों को 2025 की ईद-उल-अज़हा के दौरान धार्मिक कुर्बानी देने से बचना चाहिए। राजा ने आगे घोषणा की कि वह पूरे देश की ओर से एक प्रतीकात्मक कुर्बानी देंगे। इस फैसले के बाद, जून 2025 की ईद के जश्न के दौरान पूरे मोरक्को में पारंपरिक रूप से धार्मिक कुर्बानी नहीं दी गई।
इस रोक के पीछे मुख्य कारण क्या था? इस रोक का सबसे बड़ा कारण लंबे समय से चला आ रहा सूखा था। कई सालों से, मोरक्को में बहुत कम बारिश हो रही थी। सूखे ने खेती-किसानी को बुरी तरह प्रभावित किया था। चारा बहुत महंगा हो गया था और पानी की भारी कमी हो गई थी। इसका सीधा और विनाशकारी असर पशुपालन पर पड़ा था। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 2016 के बाद से देश में भेड़ों और मवेशियों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। अनुमानों के मुताबिक, पशुधन की आबादी में 38 प्रतिशत तक की कमी आई थी।
जैसे-जैसे उपलब्ध जानवरों की संख्या कम होती गई, उनके बाज़ार भाव आसमान छूने लगे। नतीजतन, बढ़ती महंगाई भी इस प्रतिबंध का एक प्रमुख कारण बनकर उभरी। उस समय मोरक्को के सामने सिर्फ सूखा ही एकमात्र संकट नहीं था। आम परिवारों के लिए, रोज़मर्रा के खर्चों का प्रबंधन करना लगातार मुश्किल होता जा रहा था। ऐसी परिस्थितियों में, धार्मिक कुर्बानी के लिए भेड़ खरीदना और भी कठिन हो गया था। एक भेड़ की कीमत बढ़कर $600 तक पहुँच गई थी। यह एक ऐसी राशि थी जो मोरक्को के कई गरीब और मध्यम-वर्गीय परिवारों की मासिक आय से भी ज़्यादा थी। संक्षेप में कहें तो, जहाँ एक ओर कुर्बानी की प्रथा धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई थी, वहीं इसके साथ आने वाला आर्थिक बोझ असहनीय हो गया था।
राजा मोहम्मद VI न केवल देश के राजनीतिक शासक हैं, बल्कि वे एक धार्मिक नेता का दर्जा भी रखते हैं। इसलिए, उनके बयान को बहुत महत्वपूर्ण माना गया। राजा ने घोषणा की कि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, कुर्बानी देना समाज के कमज़ोर वर्गों के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने जनता से अपील की कि वे इस वर्ष कुर्बानी देने से परहेज़ करें। इसके अलावा, उन्होंने घोषणा की कि वे स्वयं पूरे राष्ट्र की ओर से कुर्बानी देंगे। यह संदेश केवल एक प्रशासनिक आदेश मात्र नहीं था, बल्कि इसे धार्मिक और सामाजिक, दोनों ही प्रकार की राहत का एक स्रोत भी माना गया।
क्या ऐसा पहली बार हुआ था? ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। मोरक्को में इससे पहले भी इस तरह के निर्णय लिए जा चुके हैं। राजा मोहम्मद VI के पिता, राजा हसन II के शासनकाल के दौरान, धार्मिक कुर्बानी की प्रथा को कई बार स्थगित किया गया था। इस तरह के उपाय 1963, 1981 और 1996 में लागू किए गए थे। उस समय इन निर्णयों के पीछे के कारण अलग-अलग थे: कभी युद्ध का प्रभाव होता था, कभी अकाल, या कुछ मामलों में आर्थिक संकट। इस प्रकार, जहाँ 2025 में लिया गया निर्णय निश्चित रूप से नया था, वहीं यह किसी भी तरह से अभूतपूर्व नहीं था।
मोरक्को की 99 प्रतिशत आबादी इस्लाम को मानती है, जो इसे एक मुस्लिम-बहुल देश बनाता है। ऐसे देश में, ईद-उल-अज़हा के दौरान धार्मिक कुर्बानी पर रोक लगाना एक बहुत बड़ी घटना थी। यह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया। यह फैसला देश की गंभीर आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का सीधा परिणाम था।
सरकार और शाही परिवार ने तर्क दिया कि ऐसी परिस्थितियों में, धार्मिक कुर्बानी देने से देश पर एक असहनीय सामाजिक और आर्थिक बोझ पड़ेगा। यह तर्क इस बात पर आधारित था कि देश पहले से ही सूखे, बढ़ती महंगाई और पशुधन क्षेत्र में संकट का सामना कर रहा था। इन समस्याओं के कारण, आम लोगों के लिए कुर्बानी के लिए जानवर खरीदना बहुत मुश्किल हो गया था।
राजा मोहम्मद VI ने अपने संदेश में जनता से अपील की कि वे इस वर्ष कुर्बानी देने से परहेज़ करें। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, कुर्बानी देना समाज के कमज़ोर वर्गों के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे स्वयं पूरे राष्ट्र की ओर से एक प्रतीकात्मक कुर्बानी देंगे। यह कदम न केवल एक प्रशासनिक आदेश था, बल्कि इसे धार्मिक और सामाजिक राहत के स्रोत के रूप में भी देखा गया।
इस रोक के पीछे का मुख्य कारण लंबे समय से चला आ रहा सूखा था। कई सालों से, मोरक्को बहुत कम बारिश के दौर से गुज़र रहा था। सूखे ने कृषि क्षेत्र को पंगु बना दिया था; चारा बहुत महँगा हो गया था, और पानी की भारी किल्लत हो गई थी। इसका पशुपालन पर सीधा और विनाशकारी असर पड़ा था। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 2016 के बाद से देश में भेड़ों और मवेशियों की आबादी में भारी गिरावट आई थी। विभिन्न हलकों के अनुमानों से पता चला कि पशुधन की आबादी में 38 प्रतिशत तक की कमी आई थी।
जैसे-जैसे उपलब्ध जानवरों की संख्या कम होती गई, उनके बाज़ार भाव आसमान छूने लगे। नतीजतन, बढ़ती महंगाई भी इस प्रतिबंध का एक प्रमुख कारण बनकर उभरी। वास्तव में, उस समय मोरक्को के सामने केवल सूखा ही एकमात्र संकट नहीं था। आम परिवारों के लिए, रोज़मर्रा के खर्चों का प्रबंधन करना लगातार मुश्किल होता जा रहा था। इन परिस्थितियों में, धार्मिक कुर्बानी के लिए भेड़ खरीदना और भी कठिन हो गया था। एक भेड़ की कीमत बढ़कर $600 तक पहुँच गई थी – यह एक ऐसी राशि थी जो मोरक्को के कई गरीब और मध्यम-वर्गीय परिवारों की मासिक आय से भी अधिक थी। संक्षेप में कहें तो, जहाँ एक ओर कुर्बानी की प्रथा धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई थी, वहीं इसके साथ आने वाला आर्थिक बोझ असहनीय हो गया था।
राजा मोहम्मद VI ने जो कहा, वह बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि वे देश के राजनीतिक शासक होने के साथ-साथ एक धार्मिक नेता भी हैं। उन्होंने घोषणा की कि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए, कुर्बानी देना समाज के कमज़ोर वर्गों के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने जनता से अपील की कि वे इस वर्ष कुर्बानी देने से परहेज़ करें। इसके अलावा, उन्होंने घोषणा की कि वे स्वयं पूरे राष्ट्र की ओर से कुर्बानी देंगे। यह संदेश केवल एक प्रशासनिक आदेश मात्र नहीं था, बल्कि इसे धार्मिक और सामाजिक, दोनों ही प्रकार की राहत का एक स्रोत भी माना गया।
यह पहली बार नहीं था जब मोरक्को में इस तरह का फैसला लिया गया था। राजा मोहम्मद VI के पिता, राजा हसन II के शासनकाल के दौरान, धार्मिक कुर्बानी की प्रथा को कई बार स्थगित किया गया था। इस तरह के उपाय 1963, 1981 और 1996 में लागू किए गए थे। उस समय इन निर्णयों के पीछे के कारण अलग-अलग थे: कभी युद्ध का प्रभाव होता था, कभी अकाल, या कुछ मामलों में आर्थिक संकट। इस प्रकार, जहाँ 2025 में लिया गया निर्णय निश्चित रूप से नया था, वहीं यह किसी भी तरह से अभूतपूर्व नहीं था। यह दर्शाता है कि मोरक्को की सरकार ने अतीत में भी देश की आर्थिक और सामाजिक भलाई को प्राथमिकता दी है, भले ही इसका मतलब धार्मिक प्रथाओं में अस्थायी बदलाव करना हो।