Concern Over Parliamentary Decorum Democracy Runs On Dialogue Not Confrontation
रीडर्स मेल
नवभारत टाइम्स•
संसदीय राजनीति की गिरती मर्यादाओं पर चिंता जताई गई है। लोकतंत्र संवाद और सहमति से चलता है, टकराव से नहीं। संसद बहस का मंच है, शक्ति प्रदर्शन का नहीं। राजनीतिक दलों को संयम बरतना चाहिए। जनविश्वास कमजोर होना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह लेख वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालता है।
11 फरवरी को प्रकाशित एक लेख ने वर्तमान संसदीय राजनीति में घटती गरिमा पर गहरी चिंता जताई है। लेख के अनुसार, राहुल गांधी जैसे नेताओं का विरोध जारी रहेगा, लेकिन यह स्थिति पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है। लोकतंत्र संवाद और सहमति से चलता है, न कि टकराव से। संसद बहस का मंच है, शक्ति प्रदर्शन का नहीं। यदि राजनीतिक दल संयम नहीं बरतेंगे तो जनता का विश्वास कमजोर होगा, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
प्रियंका श्रीवास्तव ने ईमेल के माध्यम से यह विचार व्यक्त किया है। उनका कहना है कि संसद में होने वाली बहसें अब शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन गई हैं। यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए संवाद और आपसी सहमति बहुत जरूरी है। जब नेता एक-दूसरे से टकराव का रास्ता अपनाते हैं, तो जनता का भरोसा कम होता है। यह किसी भी देश के लिए अच्छी बात नहीं है।
इसलिए, सभी राजनीतिक दलों को संयम बरतना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि संसद सिर्फ बहस करने की जगह है, न कि अपनी ताकत दिखाने की। अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है।