क्रोध करना हो तो ज्योतिष से कोई शुभ मुहूर्त निकलवा लेना

Contributed byजैन मुनिश्री तरुणसागरजी|नवभारत टाइम्स

क्रोध और बदला लेने के लिए शुभ मुहूर्त का इंतजार करें। अपने पिता को अपनी कमाई का हिस्सा दें। घर में लगी अपनी तस्वीर पर माला चढ़ने से पहले ईश्वर की शरण लें। गालियों में भी गीत खोजने की कला सीखें। यह कला आपको क्रोधित होने से बचाएगी। ईश्वर के नाम की माला ही सच्चा धन है।

क्रोध करना हो तो ज्योतिष से कोई शुभ मुहूर्त निकलवा लेना
क्रोध और बदला लेने की भावना को लेकर एक अनोखे दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हुए, यह लेख बताता है कि इन भावनाओं को भी सही समय और तरीके से व्यक्त करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त देखा जाता है। यह लेख पिता के प्रति कर्तव्य, जीवन की नश्वरता और रिश्तों में छिपे अर्थों को खोजने की कला पर भी प्रकाश डालता है। यह सिखाता है कि कैसे छोटी-छोटी बातों में भी खुशी ढूंढी जा सकती है और कैसे गालियों में भी प्यार के मायने खोजे जा सकते हैं।

लेखक कहते हैं कि अगर आपको गुस्सा करना है या किसी से बदला लेना है, तो इसमें जल्दबाजी न करें। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि किसी ज्योतिषी के पास जाकर कहें कि मुझे गुस्सा करना है और किसी से बदला लेना है, तो वे भी इसके लिए अच्छा मुहूर्त निकालेंगे। जब शुभ कामों के लिए मुहूर्त देखा जाता है, तो फिर गुस्से जैसे काम बिना मुहूर्त के क्यों किए जाएं? उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि क्रोध के लिए पुष्य नक्षत्र में अमृत योग का मुहूर्त सबसे अच्छा होता है, लेकिन यह साल में सिर्फ दो बार आता है।
यह लेख पिता के प्रति सम्मान और कर्तव्य की भावना को भी उजागर करता है। जब आप छोटे थे और कमाते नहीं थे, तब आपके पिता आपको 'पॉकेट-मनी' देते थे। अब जब आप बड़े हो गए हैं, खुद कमाने लगे हैं और आपके पिता बूढ़े हो गए हैं, तो अब आपकी जिम्मेदारी है कि आप अपने पिता को 'पॉकेट मनी' दें। आप जो कुछ भी कमाते हैं, उसका एक हिस्सा अपने पिता के हाथ में रखें और कहें, 'पूज्य पिताश्री! यह सब कुछ तो आपका ही है, यह भावना-पुष्प स्वीकार करें और हमें आशीर्वाद दें।'

लेखक जीवन की नश्वरता की ओर भी इशारा करते हैं। अगर आपका बेटा अपने ड्राइंग रूम में आपकी सुंदर सी तस्वीर टांग कर रखता है, तो इसमें खुश न हों। बल्कि यह सोचें कि फोटो तो दीवार पर लटक ही गई है, अब पता नहीं कब इस पर माला चढ़ जाए। इसलिए, तस्वीर पर माला चढ़े, इससे पहले प्रभु की शरण में आ जाएं और प्रभु के नाम की माला फेरने बैठ जाएं। उन्होंने कहा कि माला ही असली माल है, बाकी का माल काम आने वाला नहीं है। प्रभु अच्छे और सच्चे लगें, इतना ही काफी नहीं है, प्रभु अपने लगें, यह भी जरूरी है।

इस लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रिश्तों में छिपे अर्थों को खोजने की कला पर केंद्रित है। लेखक कहते हैं कि गालियों में भी गीत होते हैं, बस उन्हें खोजने की कला आनी चाहिए। अगर यह कला आ गई, तो फिर कोई भी गाली आपको क्रोधित नहीं कर सकती। उन्होंने एक उदाहरण दिया कि पति-पत्नी में झगड़ा हो गया। पत्नी ने गुस्से में पति को जानवर कह दिया। बाद में पत्नी ने पूछा, 'मैंने तुम्हें जानवर कहा, बुरा नहीं लगा?' पति बोला, 'नहीं।' पत्नी ने पूछा, 'क्यों?' पति ने कहा, 'तू मेरी 'जान' है ना?' पत्नी बोली, 'हूं।' 'और मैं तेरा 'वर' हूं ना?' पत्नी बोली, 'हूं।' 'तो इस तरह हम और तुम 'जानवर' ही तो हुए ना।' यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे शब्दों के पीछे छिपे प्यार और अपनेपन को समझा जा सकता है।

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