अनाज से QR कोड तक पैसे का सफ़र

नवभारत टाइम्स

पैसा सिर्फ डिजिटल करेंसी नहीं है, इसका इतिहास हजारों साल पुराना है। इशांगो हड्डी से लेकर अनाज तक, पैसे ने इंसानी सभ्यता को जोड़ा है। आग ने इंसानों को सोचने और समाज को व्यवस्थित करने का समय दिया। खेती के बाद अनाज मुद्रा बना। आज QR कोड और ऑनलाइन बैंकिंग भरोसे को आसान बना रहे हैं।

from grain to qr code the 18000 year old journey of money
डिजिटल करेंसी , ब्लॉकचेन और क्रिप्टोकरंसी को भले ही हम आज के नए आविष्कार समझें, लेकिन पैसे का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी हमारी सभ्यता। लगभग 18,000 साल पहले की इशांगो हड्डी पर मिले निशान बताते हैं कि तब भी लेन-देन का हिसाब-किताब रखा जाता था। यह हड्डी, जो बबून की जांघ की है, अफ्रीका में मिली है और माना जाता है कि यह इंसानों द्वारा हिसाब-किताब रखने का सबसे पुराना सबूत हो सकती है। जैसे-जैसे इंसान छोटे समूहों से निकलकर आपस में व्यापार करने लगा, गिनती और भरोसे की जरूरत बढ़ी, और इशांगो हड्डी जैसे स्थायी रिकॉर्ड रखने के तरीके सामने आए। आग का इस्तेमाल, जो 4 लाख साल से भी पुराना है, इंसानों के विकास में मील का पत्थर साबित हुआ। इसने न सिर्फ हमारे शरीर को बदला, बल्कि हमें दूर-दूर तक जाकर शिकार करने और भोजन इकट्ठा करने में मदद की। आग पर पका खाना पचाने में आसान था, जिससे हमें ज्यादा ऊर्जा मिली और सोचने, योजना बनाने और समाज को व्यवस्थित करने का समय मिला। आग के आसपास बैठकर लोग सिर्फ खाते ही नहीं थे, बल्कि बातचीत करते, सौदे तय करते और रिश्ते भी बनाते थे।

लगभग 12,000 से 9,000 ईसा पूर्व के बीच जलवायु परिवर्तन ने खेती की शुरुआत की। अनाज उगाना संभव हुआ और सुमेर जैसी सभ्यताओं में अनाज ही मुद्रा बन गया। प्राचीन सुमेर में, खासकर जौ को पैसे की तरह इस्तेमाल किया जाता था। एक शेकेल को जौ की एक तय मात्रा के बराबर माना जाता था, जिससे लेन-देन आसान हो गया। हर शहर में अनाज का गोदाम एक केंद्रीय बैंक की तरह काम करता था, जो अनाज और पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता था। अच्छी फसल का मतलब था ज्यादा अनाज और ज्यादा पैसा चलन में आना। खेती से पैदा हुआ अतिरिक्त अनाज राज्य टैक्स के रूप में लेता था। इस तरह, पैसा सिर्फ लेन-देन का जरिया नहीं रहा, बल्कि समाज को चलाने का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।
जैसे-जैसे समाज बढ़ा, समस्याएं भी बढ़ीं। शिकारी-संग्राहक जीवन में इंसान छोटे समूहों में रहता था, लेकिन खेती से पैदा हुई अतिरिक्त उपज ने शहरों को जन्म दिया। शहरों में बड़ी संख्या में लोग एक साथ रहने लगे, जिससे एक व्यवस्था की जरूरत पड़ी। यहीं से पैसा एक सोशल टेक्नॉलजी (सामाजिक तकनीक) बन गया, जो अजनबियों को भी एक साथ लाने का जरिया बना। इशांगो हड्डी से लेकर अनाज आधारित अर्थव्यवस्थाओं तक, पैसे की कहानी असल में मानव संगठन, ऊर्जा और भरोसे की कहानी है। आज का डिजिटल युग इसी कहानी का अगला अध्याय है। QR कोड, UPI, ऑनलाइन बैंकिंग और ब्लॉकचेन, ये सब भरोसे को और आसान बनाने की कोशिशें हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले निशान हड्डी पर बनते थे, फिर कागज पर छपने लगे और अब सब कुछ सर्वर पर डिजिटल रूप में आ गया है।

इतिहास गवाह है कि पैसे का सफर कितना लंबा और दिलचस्प रहा है। ब्रसेल्स के रॉयल बेल्जियन इंस्टिट्यूट ऑफ नैचरल साइंसेज में रखी इशांगो हड्डी, जो लगभग 18,000 ईसा पूर्व की है, इस बात का पुख्ता सबूत है कि इंसान तब से ही हिसाब-किताब रखने की कोशिश कर रहा था। यह बबून की जांघ की हड्डी है, जिस पर कई निशान उकेरे गए हैं। 1950 में मिली इस हड्डी पर बने निशानों को लेकर पुरातत्वविदों में भले ही अलग-अलग राय हो, लेकिन ज्यादातर का मानना है कि ये निशान लेन-देन से जुड़े हो सकते हैं।

मानव सभ्यता की शुरुआत अफ्रीका से हुई, इसलिए यह मानना स्वाभाविक है कि पैसे की शुरुआत भी वहीं से हुई होगी। जब इंसान छोटे-छोटे समूहों में रहता था, तब उसे ज्यादा हिसाब-किताब रखने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन जैसे-जैसे लोग आपस में व्यापार करने लगे, तो गिनती और भरोसे का सवाल खड़ा होने लगा। इशांगो हड्डी शायद इसी जरूरत को पूरा करने के लिए बनाई गई थी। पुरातत्वविदों का मानना है कि इसका इस्तेमाल स्थायी रिकॉर्ड रखने के लिए किया जाता होगा।

इंसानों के विकास में आग का योगदान बहुत बड़ा है। इंसान 4 लाख साल से भी ज्यादा समय से आग का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी मानवविज्ञानी जेम्स सी. स्कॉट कहते हैं कि इंसान आग के अनुकूल प्रजाति है। आग के इस्तेमाल से हमारे शरीर में बदलाव आए और जिन जानवरों के साथ हम रहते थे या जिनका शिकार करते थे, वे भी बदल गए। पहले हम खानाबदोश थे, लेकिन आग की वजह से हम दूर-दूर तक जाकर शिकार और भोजन इकट्ठा कर पाने लगे। आग ने हमें खाना पकाना सिखाया, जिससे कम मेहनत में ज्यादा ऊर्जा मिलने लगी। इससे इंसान को सोचने, योजना बनाने और समाज को व्यवस्थित करने का समय मिला। आग के पास बैठकर इंसान न केवल खाना खाता था, बल्कि बातचीत करता था, सौदे तय करता था और रिश्ते भी जोड़ता था।

लगभग 12,000 से 9,000 ईसा पूर्व के बीच जलवायु में आए बदलावों के कारण खेती की शुरुआत हुई। जब अनाज उगाना संभव हुआ, तो सुमेर जैसी सभ्यताओं में अनाज ही मुद्रा बन गया। प्राचीन सुमेर सभ्यता में, खासकर जौ का इस्तेमाल पैसे की तरह होता था। एक शेकेल को जौ की एक तय मात्रा के बराबर माना जाता था, जिससे लेन-देन आसान हो जाता था। हर शहर में अनाज का गोदाम सबसे महत्वपूर्ण संस्था होती थी, जो एक केंद्रीय बैंक की तरह अनाज और पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करती थी। अच्छी फसल होने पर ज्यादा अनाज और ज्यादा पैसा चलन में आता था। खेती से पैदा हुआ अतिरिक्त अनाज राज्य द्वारा टैक्स के रूप में लिया जाता था। इस तरह, पैसे का काम सिर्फ लेन-देन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समाज को चलाने का एक महत्वपूर्ण औजार बन गया।

जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, वैसे-वैसे समस्याएं भी बढ़ीं। जब इंसान शिकारी-संग्राहक था, तब वह छोटे समूहों में रहता था। खेती से पैदा हुई अतिरिक्त उपज ने शहरों को जन्म दिया, जहां बड़ी संख्या में लोग एक साथ रहने लगे। शहरों में एक व्यवस्था की जरूरत पड़ी और यहीं से पैसा एक सोशल टेक्नॉलजी (सामाजिक तकनीक) बनने लगा। यह अजनबियों को भी एक साथ लाने का जरिया बन गया। इशांगो हड्डी से लेकर अनाज आधारित अर्थव्यवस्थाओं तक, पैसे की कहानी दरअसल मानव संगठन, ऊर्जा और भरोसे की कहानी है। आज का डिजिटल युग भी उसी कहानी का अगला अध्याय है। QR कोड, UPI, ऑनलाइन बैंकिंग और ब्लॉकचेन, ये सब भरोसे को और आसान बनाने की कोशिशें हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले निशान हड्डी पर बनते थे, फिर कागज पर बनने लगे और अब सब कुछ सर्वर पर आ गया है।

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