मौसम पर मुक़दमा

नवभारत टाइम्स

देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है पर शेयर बाजार गिर रहा है। रुपया भी लगातार चढ़ रहा है। पंचायतों में काम रुका हुआ है। सड़कों पर मैनहोल खुले हैं और लोग उनमें गिर रहे हैं। सीवर और नालों में भी लोग गिर रहे हैं। यह सब मौसम के कारण हो रहा है। इस मौसम पर मुकदमा करने का विचार है।

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अर्थव्यवस्था भले ही चमक रही हो और लोग शेयर बाजार में खूब पैसा लगा रहे हों, लेकिन शेयर बाजार लगातार गिर रहा है। रुपया भी 100 के पार जाने की कसम खाए हुए है। वहीं, पंचायतें काम नहीं कर पा रही हैं क्योंकि लोग सड़क-नाली जैसे स्थानीय मुद्दों पर बात करने के बजाय पड़ोसी गांवों के खेतों में घुसपैठ जैसे मुद्दों पर अटके हुए हैं। सड़कों की हालत भी खराब है, मैनहोल खुले पड़े हैं और लोग उनमें गिर रहे हैं। सीवर और नालों में भी लोग गिर रहे हैं। इस सबके बीच, लोग ढक्कन लगाने वालों को दोष दे रहे हैं, जबकि असल समस्या मौसम की है जो सब कुछ गिराने पर तुला है।

देश की अर्थव्यवस्था इस समय ज़ोरों पर है। लोगों की कमाई इतनी बढ़ गई है कि वे झोला भर-भर कर पैसा शेयर बाजार में लगा रहे हैं। लेकिन, शेयर बाजार है कि गिरने का नाम ही नहीं ले रहा। वहीं, भारतीय रुपया भी मानो किसी विदेशी की कसम खाए बैठा है कि 100 के आंकड़े को पार किए बिना रुकेगा नहीं। दूसरी तरफ, पंचायत ों में कामकाज ठप पड़ा है। सरपंच बार-बार लोगों से अपने गांव की सड़क-नाली जैसी ज़रूरी बातों पर चर्चा करने का आग्रह कर रहे हैं। वे यह भी बताना चाहते हैं कि पंचायत ने कितना पैसा खर्च करने का बजट बनाया है। लेकिन, लोग इन बातों को सुनने को तैयार ही नहीं हैं। वे तो बस पड़ोसी गांवों पर ही चर्चा करना चाहते हैं।
लोग लगातार सवाल पूछ रहे हैं कि पड़ोसी गांव वाले उनके खेतों में कैसे घुस आए। वे तरह-तरह की किताबें और पर्चे लहरा रहे हैं। सरपंच बार-बार यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि कोई भी पड़ोसी गांव वाला उनके खेतों में नहीं आया था। लेकिन, लोग अपनी बात पर अड़े हुए हैं और वहां से टस से मस नहीं हो रहे। ऐसा लगता है मानो वे कुछ गिराकर ही मानेंगे।

गिरने-गिराने का यह शोर इतना ज़्यादा है कि सड़कों का मिजाज भी बदल गया है। मैनहोल तो जैसे खुद को रोक ही नहीं पा रहे हैं और अपना ढक्कन खिसका कर यह नज़ारा देखने के लिए तैयार हो गए हैं। अगले दिन-रात लोग इन ढक्कनों को वापस लगाने में जुटे रहते हैं, पर मैनहोल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे।

जब सड़कों का यह हाल है, तो सीवर और नाले क्यों पीछे रहने वाले थे? पता नहीं उन्होंने क्या चाल चलनी शुरू कर दी है कि लोग यहां-वहां उनमें गिरते जा रहे हैं। कुछ लोग तो इसमें भी नुक्स निकाल रहे हैं कि ढक्कन लगाने वाले ठीक से काम नहीं कर रहे और नाले खोदकर यूं ही छोड़ दिए जा रहे हैं।

लेकिन, ये लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इसमें इंतजामिया कमिटी का कोई दोष नहीं है। मैनहोल तो पहले भी खुले रहते थे। सड़कें बनाकर उन्हें फिर से खोदकर नाले बनाने का चलन भी बहुत पुराना है। इस बार जो नया है, वह है मौसम। पतझड़ की आड़ में यह न जाने क्या-क्या गिराने पर तुला है। ऐसे में, यह कितना अच्छा होता कि हम इस वसंत पर ही मुकदमा कर देते!

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