मुंबई से मिलो और बातें करो, ये बुलाता है तुम्हें

नवभारत टाइम्स

मुंबई शहर स्मृतियों का खजाना है। यहाँ हर कदम पर एक कहानी मिलती है। यह शहर सिनेमा और संगीत के गलियारों में जीवंत है। हाल ही में एक सिटी वॉक का आयोजन हुआ। यह वॉक चर्चगेट से शुरू होकर एशियाटिक लाइब्रेरी तक गई। लोगों ने ओवल मैदान और राजाबाई टावर जैसी जगहों को देखा।

मुंबई से मिलो और बातें करो, ये बुलाता है तुम्हें
मुंबई जैसे शहर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, बल्कि ये यादों का खज़ाना होते हैं। हर गली, हर मोड़ पर एक कहानी छिपी होती है। हाल ही में, रेडियो उद्घोषक यूनुस खान ने साउथ मुंबई के इसी इलाके में एक अनोखी 'सिटी वॉक' का आयोजन किया। यह वॉक चर्चगेट के पास गैलॉर्ड रेस्टोरेंट से शुरू होकर एशियाटिक लाइब्रेरी तक गई। इस दौरान, यूनुस खान ने रास्ते की हर जगह से जुड़े किस्से सुनाए। यह आयोजन राजकमल प्रकाशन के किताब उत्सव का हिस्सा था, जो किताबों से निकलकर सिनेमा और संगीत की दुनिया में भी पहुंचा। ओवल मैदान पहुंचते ही लोगों को कई फिल्मों के सीन और गाने याद आ गए। अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी पर फिल्माया गया गाना ‘रिमझिम गिरे सावन’ इस मैदान को देखते ही लोगों के ज़हन में आ गया। लोग ओवल मैदान के पार खड़े राजाबाई टावर को हैरानी से देख रहे थे, जिसे उन्होंने राज कपूर और बिमल रॉय की कई फिल्मों में देखा था।

मुंबई के फोर्ट इलाके में शाम के समय कामकाजी लोग सीएसएमटी और चर्चगेट स्टेशनों की ओर भागते हैं। उनके रास्ते में कई ऐतिहासिक सिनेमाघर, मैदान, रेस्टोरेंट के साथ-साथ कालाघोड़ा और जहांगीर आर्ट गैलरी जैसी सांस्कृतिक जगहें भी आती हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग इन जगहों से अनजान होते हैं। यूनुस खान ने लोगों से कहा कि इन इमारतों और दीवारों को थोड़ा रुककर, ध्यान से देखें, इनसे बातें करें, क्योंकि ये इमारतें भी बातें करती हैं।
मुंबई की इस 'सिटी वॉक' ने आयरलैंड के डबलिन शहर की एक ऐसी ही वॉक की याद दिला दी। डबलिन की यह वॉक दुनिया भर में अपनी तरह की अनोखी, खूबसूरत, ऐतिहासिक और जुनून से भरी हुई है। इस वॉक के पीछे की कहानी भी बहुत खास है। आयरलैंड के लेखक जेम्स जॉयस ने अपने उपन्यासों और कहानियों में अपने प्यारे शहर डबलिन को इस तरह पेश किया है कि कहा जाता है कि अगर डबलिन शहर नष्ट भी हो जाए, तो जेम्स जॉयस को पढ़कर उसे दोबारा वैसा ही बसाया जा सकता है।

जेम्स जॉयस का उपन्यास ‘यूलिसेस’ 1922 में छपा था। इस उपन्यास का मुख्य किरदार लियोपोल्ड ब्लूम 16 जून, 1904 को शहर में निकलता है। यह पूरा उपन्यास इसी एक दिन की कहानी कहता है। ब्लूम समंदर किनारे, कॉफी हाउस, रेस्टोरेंट, अखबार के दफ्तर और शराबखाने में जहाँ-जहाँ जाता है, आज भी हर साल 16 जून को डबलिन के लोग उन्हीं जगहों पर जाते हैं। लोग वैसे ही कपड़े पहनते हैं, जैसे उपन्यास के किरदारों ने पहने थे। वे रेस्टोरेंट में वही खाना खाते हैं, जो ब्लूम ने खाया था। किसी शहर से प्यार की इससे खूबसूरत मिसाल और क्या हो सकती है।

यूनुस खान की यह 'सिटी वॉक' सिर्फ एक सैर नहीं थी, बल्कि यह मुंबई के इतिहास, सिनेमा और संगीत से जुड़ा एक अनुभव था। गैलॉर्ड रेस्टोरेंट जैसी जगहों पर शंकर-जयकिशन की धुनें राज कपूर की ख्वाहिशों को जगाती थीं, तो वहीं बाहर जगजीत सिंह जैसे कलाकार अपनी आवाज़ का जादू बिखेरने के लिए किसी का इंतज़ार करते थे। यह वॉक लोगों को शहर की उन गलियों में ले गई जहाँ हर ईंट में एक कहानी दबी हुई है।

ओवल मैदान का नज़ारा लोगों को फिल्मों की दुनिया में ले गया। ‘रिमझिम गिरे सावन’ जैसे गाने इस मैदान से जुड़ गए। राजाबाई टावर को देखकर लोगों को राज कपूर और बिमल रॉय की फिल्में याद आ गईं। यह वॉक उन लोगों के लिए एक आईना थी जो रोज़ाना इन रास्तों से गुज़रते हैं पर इन ऐतिहासिक जगहों की अहमियत को नहीं समझते। यूनुस खान ने लोगों को रुककर इन इमारतों से जुड़ने का संदेश दिया।

डबलिन की 'यूलिसेस' वॉक की तरह, मुंबई की यह 'सिटी वॉक' भी शहर को एक नए नज़रिए से देखने का मौका देती है। यह दिखाती है कि कैसे एक शहर अपनी यादों, अपनी कला और अपने लोगों के ज़रिए ज़िंदा रहता है। जेम्स जॉयस ने डबलिन को अपनी कहानियों से अमर कर दिया, उसी तरह मुंबई भी अपनी फिल्मों, अपने संगीत और अपनी अनूठी संस्कृति से हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेगा। यह वॉक एक याद दिलाने वाली यात्रा थी कि हमारा शहर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि हमारी पहचान का एक अहम हिस्सा है।

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