Swami Dayanand Saraswati The Great Man Who Sacrificed His Life For The Kings Dharma And Truth
राजा का धर्म
नवभारत टाइम्स•
स्वामी दयानंद सरस्वती ने जोधपुर में महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय को प्रजा सेवा का महत्व समझाया। उन्होंने राजा को विषय-विलास से दूर रहने की सलाह दी। सत्य के प्रति उनकी निष्ठा ने विरोध उत्पन्न किया और उन्हें विष दिया गया। असहनीय पीड़ा में भी उन्होंने रसोइए को क्षमा कर दिया।
जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह-द्वितीय के दरबार में 1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्य और साहस का ऐसा पाठ पढ़ाया कि पूरा दरबार सन्न रह गया। विद्वान स्वामी ने राजा को राजधर्म याद दिलाया, जो प्रजा की सेवा है, न कि विषय-विलास। राजा के कर्तव्य से विमुख होने पर स्वामी ने निर्भीक होकर कहा, "राजा का प्रथम धर्म प्रजा की सेवा है। विषय-विलास में लिप्त होना राजधर्म के अनुकूल नहीं। जो शासक कर्तव्य से विमुख होता है, वह राज्य का अहित करता है।" इस स्पष्टवादिता का परिणाम यह हुआ कि स्वामी को विष दे दिया गया, लेकिन उन्होंने मरते दम तक रसोइए को क्षमा कर दिया। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में उनका निधन हो गया। यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चा नेतृत्व सत्य, साहस और क्षमा पर टिका होता है।
स्वामी दयानंद सरस्वती 1883 में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह-द्वितीय के निमंत्रण पर उनके दरबार में आए थे। उनकी विद्वता और बेबाक बातों से सभी बहुत प्रभावित थे। लेकिन स्वामी जी सिर्फ सम्मान पाने नहीं आए थे, बल्कि वे सत्य का संदेश देना चाहते थे। उन्होंने देखा कि महाराजा राज्य के जरूरी कामों से ज्यादा अपनी सुख-सुविधाओं में समय बिता रहे थे। यह देखकर स्वामी जी को बहुत दुख हुआ।एक दिन उन्होंने हिम्मत करके राजा से कहा, "राजा का पहला फर्ज अपनी प्रजा की सेवा करना है। अपनी सुख-सुविधाओं में डूबे रहना राजा के धर्म के खिलाफ है। जो राजा अपने फर्ज से मुँह मोड़ लेता है, वह अपने राज्य का नुकसान करता है।" स्वामी जी की इन बातों से दरबार में एकदम सन्नाटा छा गया। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि राजा को उसकी गलती बता सके। लेकिन स्वामी जी के लिए सच सबसे ऊपर था।
स्वामी जी की सीधी बात कुछ लोगों को अच्छी नहीं लगी। उनका विरोध बढ़ने लगा और आखिरकार उन्हें जहर दे दिया गया। असहनीय दर्द में भी उन्होंने उस रसोइए को माफ कर दिया जिसने उन्हें जहर दिया था। 30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में उनका देहांत हो गया। यह किस्सा हमें सिखाता है कि असली लीडरशिप सच, हिम्मत और माफी पर आधारित होती है। जो लोग अपने सिद्धांतों पर डटे रहते हैं, वही समाज में असली बदलाव ला पाते हैं।