Batool Begum Breaking Barriers To Reach Padma Shri Dream Of Singing Bhajans At Ram Mandir Fulfilled
दहलीज लांघी तो मिला 'पद्मश्री'
नवभारत टाइम्स•
जयपुर की बतूल बेगम को 'सातवें लोक निर्मला सम्मान' मिला। समाज की बंदिशों को तोड़कर उन्होंने गायन में 'पद्मश्री' हासिल किया। बचपन में भजन सुनने की ललक ने उन्हें प्रेरित किया। पति के सहयोग से उन्होंने कला को जारी रखा। राम मंदिर में भजन गाने का उनका सपना भी पूरा हुआ।
जयपुर की 74 वर्षीय बतूल बेगम को लखनऊ में 'सातवें लोक निर्मला सम्मान' से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें 'सोनचिरैया' संस्था ने दिया। बतूल बेगम ने अपने जीवन की कहानी बताई, जिसमें उन्होंने समाज की पाबंदियों को तोड़कर संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने बचपन में ही निकाह होने के बावजूद छिप-छिपकर भजन सुने और अपनी कला को निखारा। उनके पति ने हमेशा उनका साथ दिया, जिससे उन्हें पद्मश्री सम्मान भी मिला। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान वहां भजन गाने का उनका सपना भी पूरा हुआ।
बतूल बेगम ने बताया कि जब वह सिर्फ पांच साल की थीं, तब उनकी शादी हो गई थी। जिस गांव में महिलाओं को ऊंची आवाज में बोलने की इजाजत नहीं थी, वहां वह छिपकर मंदिर में भजन सुनने जाती थीं। उनके दिल में संगीत इस कदर बस गया कि समाज की बनाई हुई बेड़ियां उन्हें छोटी लगने लगीं। लोग उन्हें ताने मारते थे और मजहब का हवाला देते थे, लेकिन उनके अंदर का 'रसखान' बस यही कहता था, "मानुष हों तो वही रसखान, बसौ ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।" ये शब्द जयपुर की 74 वर्षीय बतूल बेगम के हैं।रविवार को लखनऊ के संगीत नाटक अकादमी में 'सोनचिरैया' संस्था ने उन्हें वर्ष 2026 के 'सातवें लोक निर्मला सम्मान' से नवाजा। इस मौके पर उन्होंने एनबीटी से अपनी कहानी साझा की। उनकी बातों में बीता हुआ दर्द भी था और अपनी कला को दुनिया भर में फैलाने की खुशी भी।
बचपन से ही बतूल बेगम को पढ़ने का बहुत शौक था। वह अपने चाचा के बेटों के साथ छिपकर स्कूल जाती थीं, ताकि कम से कम अपना नाम लिखना सीख सकें। जब उन्होंने बाहर भजन गाना शुरू किया, तो समाज ने उनसे मुंह मोड़ लिया। लेकिन 18 साल की उम्र में जब उनका गौना हुआ, तो उनके शौहर एक ढाल बनकर उनके साथ खड़े हो गए। उन्होंने दुनिया की परवाह नहीं की और बतूल बेगम को कभी गाने से नहीं रोका।
संघर्ष के रास्तों पर चलते हुए उन्होंने अपनी कला को कभी नहीं छोड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2025 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया। जब राष्ट्रपति भवन में उनके नाम की गूंज हुई, तो उन्हें अपने गांव की वो तंग गलियां याद आ गईं, जहाँ कभी उन्हें गुनगुनाने पर भी टोका जाता था। बतूल बेगम का मानना है कि यह मेडल सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हर उस औरत का है जो अपने सपनों को दबाकर बैठी है।
अपनी भक्ति से जुड़ी एक बहुत ही भावुक याद साझा करते हुए बतूल बेगम की आंखें भर आईं। उन्होंने बताया कि साल 1989 में उनके शौहर उन्हें राम मंदिर ले गए थे। तब मंदिर की हालत देखकर उनका कलेजा फट गया था। उन्होंने वहीं मन्नत मांगी थी कि जब कभी यह मंदिर अपनी पूरी शान से खड़ा होगा, तो वह वहां भजन गाएंगी। साल 2025 में जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई और उन्हें वहां गाने का मौका मिला, तो उन्हें लगा जैसे अल्लाह ने उनकी बरसों पुरानी मुराद सुन ली हो।