इंसानियत का दीप

नवभारतटाइम्स.कॉम•
light the lamp of humanity on diwali inner purity not outer glitz is the true light
दीपावली पर घर दीपों से सजे या न सजे, फूलों की लड़ियां लगें या न लगें, रंगीन रोशनी से आंगन जगमगाए या न जगमगाए, लेकिन मन में इंसानियत और मानवता का दीप अवश्य जलना चाहिए। मन के दीप के आगे बाकी सभी दीप फीके हैं। यदि मन में मानवता का प्रकाश नहीं है, तो बाहरी जगमगाहट महज दिखावा है। सभ्यता और संस्कारों के लिए पहचाने जाने वाले हमारे देश में आज कुसंस्कारों का प्रभाव बढ़ रहा है। नागरिकों में वैचारिक चेतना का भी क्षय हो रहा है। ऐसे माहौल में जरूरी है कि हम अपनी सोच और कर्म में नैतिकता व संस्कारों का दीप जलाएं। तभी दीपावली की रोशनी सार्थक होगी।

हेमा हरि उपाध्याय 'अक्षत', ईमेल से
 किताबों से करें दोस्ती

NBT में शुक्रवार के संपादकीय पन्ने पर 'सिखाती ही नहीं, तनाव भी मिटाती है किताबें ' आलेख पढ़ा। किताबें न केवल तनाव दूर करती हैं, बल्कि जीवन को सही दिशा भी देती हैं। एक समय था, जब लोगों के हाथों में पुस्तकें नजर आती थीं। बच्चों में भी बाल पुस्तकों के प्रति खासा आकर्षण था और पुस्तकालय गुलजार रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोग किताबों से दूर होते चले गए। टीवी, मोबाइल और कंप्यूटर ने इस दूरी को और बढ़ा दिया है। आज जरूरत है कि हम फिर से पढ़ने की आदत विकसित करें। अगर सच्चा दोस्त चाहिए, तो किताबों को अपना साथी बनाइए, क्योंकि वे कभी दगा नहीं देतीं। किताबें ज्ञान बढ़ाने के साथ हमारी सोच को भी व्यापक बनाती हैं। अच्छी बात यह है कि आज भी कई लोगों का पुस्तकों के प्रति लगाव बना हुआ है।

साजिद अली, ईमेल से

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