कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट: शेयर बाजारों में तेजी, निक्केई रिकॉर्ड ऊंचाई पर, डॉलर पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट: शेयर बाजारों में तेजी, निक्केई रिकॉर्ड ऊंचाई पर, डॉलर पर दबाव
NewsPoint•
कच्चे तेल के दाम गिरने से महंगाई पर लगाम लगने की उम्मीद जगी है। इसका सीधा असर शेयर बाजारों पर दिख रहा है। एशियाई बाजारों में जबरदस्त तेजी आई है, जापान का निक्केई सूचकांक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। डॉलर पर भी दबाव बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट ने दुनिया भर के शेयर बाजारों में रौनक ला दी है। महंगाई कम होने की उम्मीदों के चलते एशियाई शेयर बाजारों में जबरदस्त उछाल देखा गया है, वहीं जापान का निक्केई इंडेक्स रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। डॉलर इंडेक्स पर भी दबाव बना हुआ है, जिससे निवेशकों का रुझान सुरक्षित निवेश से हटकर इक्विटी और उभरते बाजारों की ओर बढ़ रहा है।
कच्चे तेल के दाम गिरने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल सस्ता होने से ट्रांसपोर्टेशन, उत्पादन और बिजली का खर्च कम हो जाता है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर जो बोझ पड़ता है, वह हल्का हो जाता है। इसी उम्मीद ने शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। जब तेल सस्ता होता है, तो यह एक तरह से अच्छी खबर होती है क्योंकि इससे लोगों और कंपनियों का खर्च कम होता है।तेल की कीमतों में गिरावट के बाद एशिया के शेयर बाजारों में खूब खरीदारी हुई। जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग जैसे देशों के बाजारों में निवेशकों ने ज्यादा जोखिम उठाने का मन बनाया, जिससे वहां के शेयर सूचकांक ऊपर चढ़ गए। खासकर जापान का निक्केई इंडेक्स तो इतिहास रचते हुए रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। यह दिखाता है कि निवेशक जापान की कंपनियों पर कितना भरोसा कर रहे हैं। निक्केई 225 में यह तेजी खास तौर पर टेक्नोलॉजी कंपनियों और उन कंपनियों की वजह से आई है जो दूसरे देशों को सामान बेचती हैं (निर्यात आधारित कंपनियां)। निवेशकों को लगता है कि दुनिया भर में मांग बढ़ने और लागत कम होने से जापानी कंपनियों को खूब फायदा होगा।
डॉलर के कमजोर होने का असर दुनिया भर की मुद्राओं पर भी पड़ा है। निवेशक अब सोने-चांदी जैसी सुरक्षित जगहों पर पैसा लगाने के बजाय शेयर बाजार और उभरते देशों के बाजारों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इसकी वजह से एशियाई देशों की मुद्राएं थोड़ी मजबूत हुई हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि कच्चे तेल के दाम गिरने और डॉलर के कमजोर होने से दुनिया भर के बाजारों में जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका सीधा फायदा भारत जैसे उभरते बाजारों को मिल रहा है। जब तेल सस्ता होता है और डॉलर कमजोर होता है, तो यह एक संकेत होता है कि निवेशक ज्यादा जोखिम उठाने को तैयार हैं। इससे उन देशों को फायदा होता है जिनकी अर्थव्यवस्थाएं अभी बढ़ रही हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि तेल बाजार में अभी भी उथल-पुथल मची रह सकती है। अगर दुनिया में कोई बड़ी राजनीतिक समस्या आती है या तेल उत्पादन में कटौती होती है, तो तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं। इससे शेयर बाजारों की चाल भी बदल सकती है। इसलिए, आगे की स्थिति पर नजर रखना बहुत जरूरी है। तेल की कीमतें कई बातों पर निर्भर करती हैं, जैसे कि देशों के बीच संबंध और तेल निकालने वाले देशों के फैसले। अगर ये चीजें बदलती हैं, तो तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है।