समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कोलकाता और मुंबई में लाखों लोग खतरे में, यूएन रिपोर्ट में चेतावनी
समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कोलकाता और मुंबई में लाखों लोग खतरे में, यूएन रिपोर्ट में चेतावनी
NewsPoint•
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने दुनिया को चौंका दिया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. इसका सीधा असर भारत के कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े शहरों पर पड़ेगा. यहां रहने वाले लाखों लोग बेघर हो सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया भर में करोड़ों लोग खतरे में हैं और अरबों डॉलर की संपत्ति डूब सकती है. यह समस्या सिर्फ तटीय इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सेहत, खाने-पीने और हमारी संस्कृति पर भी पड़ेगा.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की एक रिपोर्ट ने दुनिया भर में चिंता की लहर दौड़ा दी है. यह रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र का जलस्तर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है. इस बढ़ोतरी का सबसे बुरा असर भारत के कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े शहरों पर पड़ने वाला है. इन शहरों में रहने वाले लाखों लोग अपना घर खो सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी साफ तौर पर कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर और बर्फ की मोटी परतें पिघल रही हैं. साथ ही, समुद्र का पानी भी गर्म हो रहा है. इन दोनों वजहों से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिसका असर हमारी संपत्ति, लोगों और यहां तक कि हमारी संस्कृति पर भी पड़ेगा.यह रिपोर्ट पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक में जारी की गई. इस बैठक की मेजबानी पलाऊ नाम का एक छोटा सा देश कर रहा था, जो प्रशांत महासागर में स्थित है. इस देश के कई द्वीप समुद्र में डूबने के कगार पर हैं. रिपोर्ट जारी करने वाली सेक्रेटरी-जनरल अमीना मोहम्मद ने बताया कि 2024 में समुद्र के जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. यह बढ़ोतरी लगभग छह मिलीमीटर दर्ज की गई है. यह आंकड़ा बहुत डराने वाला है और यह दिखाता है कि खतरा कितना गंभीर है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दक्षिण एशिया के निचले इलाकों और भारत के कोलकाता व मुंबई जैसे शहरों में रहने वाले करीब 1.4 करोड़ से ज्यादा लोगों के घर हमेशा के लिए पानी में डूब सकते हैं. बांग्लादेश की राजधानी ढाका भी इस खतरे से अछूती नहीं है. रिपोर्ट में इस भयानक स्थिति के होने की कोई तय समय-सीमा नहीं बताई गई है, लेकिन यह साफ है कि खतरा बहुत बड़ा है.
न्यूयॉर्क में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में असिस्टेंट सेक्रेटरी-जनरल नाविद हनीफ ने इस मुद्दे पर और जानकारी दी. उन्होंने कहा कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर एक बड़ी चुनौती है. तटीय इलाकों में रहने वाले लोग अपना किनारा खो रहे हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर सिर्फ समुद्र के किनारे रहने वाले लोगों तक ही सीमित नहीं है. यह एक बहुत बड़ी व्यवस्थागत समस्या है. इसका असर हमारी सेहत पर पड़ेगा, हमारे खाने-पीने की चीजों की सुरक्षा पर पड़ेगा, हमारे मानवाधिकारों पर पड़ेगा और हमारी संस्कृति पर भी पड़ेगा. आप अपनी पुश्तैनी जमीन खो देंगे, अपनी पहचान खो देंगे. इसलिए, सरकारों को इस मुद्दे को अपनी योजनाओं में बहुत गंभीरता से शामिल करना होगा.
हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालय से ग्लेशियर टूटने की घटना हुई थी. इससे पानी और कीचड़ का सैलाब आया था, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई और कई इलाके तबाह हो गए. जब नाविद हनीफ से हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के असर के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हिमालय के ग्लेशियरों को 'तीसरा ध्रुव' कहा जाता है. उन्होंने समझाया कि जैसे उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव हैं, वैसे ही दक्षिण एशिया में दुनिया के ग्लेशियरों का एक बड़ा भंडार होने के कारण इसे 'तीसरा ध्रुव' माना जाता है.
हनीफ ने चेतावनी दी कि अगले 15 से 20 सालों में दक्षिण एशिया में ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ का खतरा है. इसके बाद सूखा पड़ सकता है, जिससे फसलें बर्बाद हो सकती हैं और खाने-पीने की चीजों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है. इससे बड़े जोखिम पैदा होंगे.
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग खतरे में हैं. इसका मतलब है कि धरती पर हर दस में से एक व्यक्ति ऐसे तटीय इलाकों में रहता है, जो हाई-टाइड लाइन (ज्वार-भाटा के दौरान पानी के सबसे ऊंचे स्तर की रेखा) से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं. ये लोग पहले से ही कई खतरों का सामना कर रहे हैं. अनुमान है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से दुनिया भर में कम से कम 1.8 ट्रिलियन डॉलर की कीमत वाले इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) को खतरा है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पहले से ही शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, पानी की व्यवस्था, परिवहन, बिजली ग्रिड, इमारतें और भूजल संसाधनों को नुकसान पहुंच रहा है. इसके दूरगामी परिणाम हो रहे हैं, जो लंबे समय में मानवाधिकारों के प्रभावी उपभोग के लिए खतरा पैदा करते हैं.
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने का सबसे ज्यादा खतरा द्वीपीय देशों को होगा, लेकिन यह खतरा किसी भौगोलिक सीमा को नहीं मानता. उदाहरण के तौर पर, अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क जैसे अमीर शहरों और चीन के ग्वांगझू जैसे शहरों में भी तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ेगा. इन शहरों में खतरे में पड़ी संपत्तियों का अनुमानित मूल्य 2 ट्रिलियन डॉलर से 3.5 ट्रिलियन डॉलर के बीच है. यह दिखाता है कि यह समस्या कितनी बड़ी और व्यापक है.