भारत की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 272 GW पार, सौर और पवन ऊर्जा में बड़ी वृद्धि

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भारत की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 272 गीगावाट पार कर गई है। सौर ऊर्जा का योगदान 141 गीगावाट और पवन ऊर्जा का 55 गीगावाट है। यह भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल के शुभारंभ के मौके पर बताया गया। यह भारत के 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

indias non fossil fuel capacity crosses 272 gw record growth in solar and wind power focus on offshore wind
नई दिल्ली, 18 फरवरी: भारत की गैर-जीवाश्म आधारित बिजली उत्पादन क्षमता 272 गीगावाट के पार पहुँच गई है, जिसमें सौर ऊर्जा का 141 गीगावाट और पवन ऊर्जा का 55 गीगावाट योगदान है। यह बड़ी उपलब्धि भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल के शुभारंभ के मौके पर केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बताई। यह भारत के 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अवसर पर ब्रिटेन के उप प्रधानमंत्री डेविड लैमी और भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त लिंडी कैमरून भी मौजूद थीं।

मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 35 गीगावाट से अधिक सौर और 4.61 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल ही भारत ने अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया था, जो निर्धारित लक्ष्य से पांच साल पहले ही पूरा हो गया। जोशी ने कहा, "आज भारत की स्थापित गैर-जीवाश्म क्षमता 272 गीगावाट से अधिक है जिसमें सौर से 141 गीगावाट और पवन से 55 गीगावाट है।" उन्होंने आगे कहा कि भारत की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 'प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के तहत दो साल से भी कम समय में करीब 30 लाख परिवारों को 'रूफटॉप सोलर' की सुविधा मिली है। इसके अलावा, 'प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान' योजना के तहत 21 लाख पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा गया है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि ये आंकड़े भारत की स्पष्ट नीतियों, संस्थागत तालमेल और निवेशकों के भरोसे को दर्शाते हैं।
हालांकि, मंत्री जोशी ने यह भी स्वीकार किया कि अगले चरण में विश्वसनीयता, ग्रिड की स्थिरता, औद्योगिक गहराई और ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने अपतटीय पवन ऊर्जा को भविष्य की एक महत्वपूर्ण ऊर्जा के रूप में रेखांकित किया। इसके लिए गुजरात और तमिलनाडु के तटों के पास कुछ क्षेत्रों की पहचान की गई है। उन्होंने बताया कि शुरुआती 10 गीगावाट अपतटीय निकासी क्षमता (गुजरात और तमिलनाडु में पांच-पांच गीगावाट) के लिए पारेषण योजना पूरी हो चुकी है। इन शुरुआती परियोजनाओं को सहारा देने के लिए 7,453 करोड़ रुपये की एक व्यवहार्यता अंतर निधि योजना भी शुरू की गई है, जो लगभग 71 करोड़ पाउंड के बराबर है।

जोशी ने कहा, "जैसा कि हम सभी जानते हैं, अपतटीय पवन वैश्विक ऊर्जा बदलाव के सबसे जटिल क्षेत्रों में से एक है।" उन्होंने समझाया कि इसके लिए विशेष बंदरगाहों, समुद्री लॉजिस्टिक्स, समुद्र तल पट्टे की मजबूत व्यवस्था और व्यवहार्य व्यावसायिक ढांचे जैसी चीजों की जरूरत होती है। इसी कारण से, भारत-ब्रिटेन अपतटीय पवन ऊर्जा कार्यबल का गठन बहुत महत्वपूर्ण है। यह कार्यबल भारत-ब्रिटेन दृष्टिपत्र 2035 और चौथे ऊर्जा संवाद के तहत बनाया गया है ताकि भारत के अपतटीय पवन ऊर्जा क्षेत्र को एक रणनीतिक दिशा और समन्वय मिल सके।

मंत्री ने ब्रिटेन की प्रशंसा करते हुए कहा कि ब्रिटेन ने अपतटीय पवन ऊर्जा के विस्तार में वैश्विक नेतृत्व दिखाया है, जो शुरुआती तैनाती से लेकर परिपक्व आपूर्ति श्रृंखलाओं वाले बड़े व्यावसायिक बाजारों तक फैला हुआ है। उन्होंने कहा, "भारत व्यापकता, दीर्घकालिक मांग और तेजी से बढ़ता स्वच्छ ऊर्जा तंत्र लेकर आता है।" जोशी ने बताया कि भारत और ब्रिटेन मिलकर तीन मुख्य स्तंभों पर काम कर सकते हैं। पहला स्तंभ 'पारिस्थितिकी योजना एवं बाजार संरचना' है। इसमें समुद्र तल के ढांचे को बेहतर बनाना, ग्रिड की तैयारी के अनुसार निविदा की समय-सीमा तय करना और पारदर्शी राजस्व सुनिश्चित करने वाले तंत्र बनाना शामिल है।

दूसरा स्तंभ 'ढांचा और आपूर्ति श्रृंखला' है। इसके तहत बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, आधारभूत संरचनाओं का विकास, टावरों, पंखों और केबलों का स्थानीय स्तर पर निर्माण, विशेष जहाजों की उपलब्धता और समुद्री परिचालन के लिए कौशल विकास पर ध्यान दिया जाएगा। तीसरा स्तंभ 'वित्तपोषण एवं जोखिम न्यूनीकरण' है। इसमें मिश्रित वित्त ढांचे का उपयोग करना, शुरुआती जोखिमों को कम करने वाले उपकरण अपनाना और दीर्घकालिक संस्थागत पूंजी का लाभ उठाना शामिल है।

जोशी ने यह भी बताया कि अपतटीय पवन ऊर्जा को पारेषण योजना, भंडारण समाधान और उभरते हुए तटीय हरित हाइड्रोजन समूहों से भी जोड़ा जाएगा। उन्होंने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत हरित हाइड्रोजन की कीमत घटकर सबसे कम 279 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई है। मंत्री ने इस कार्यबल को एक "विश्वास बल" बताया, जो यह साबित करता है कि भारत और ब्रिटेन मिलकर जमीनी स्तर पर आने वाली वास्तविक चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।

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