Delhis Diwali Green Crackers How Effective Are They In Reducing Pollution
क्या दिल्ली की दीवाली पर 'ग्रीन पटाखे' वाकई हानिकारक प्रदूषण को कम कर सकते हैं?
TOI.in•
दिल्ली में दीवाली पर प्रदूषण की चिंता फिर बढ़ गई है। 'ग्रीन पटाखे' कम हानिकारक माने जाते हैं, पर विशेषज्ञों का कहना है कि ये भी बारीक कण छोड़ते हैं। इन पटाखों से पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम एल्युमीनियम, सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट का इस्तेमाल होता है।
नई दिल्ली: दिवाली आते ही दिल्ली में प्रदूषण की चिंता फिर बढ़ गई है। इस बार भी "ग्रीन क्रैकर्स" यानी पर्यावरण-अनुकूल पटाखों पर सबकी नजरें हैं। ये पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हानिकारक माने जाते हैं। इन्हें छोटे खोल और कम खतरनाक रसायनों से बनाया जाता है। कहा जाता है कि ये 30% तक कम कण (particulate matter) छोड़ते हैं और शोर भी कम करते हैं। लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि ये "ग्रीन" पटाखे भी खतरनाक बारीक कण छोड़ते हैं, जिससे उनकी "हरियाली" पर सवाल उठते हैं।
ग्रीन क्रैकर्स क्या हैं?ग्रीन क्रैकर्स ऐसे पटाखे हैं जिन्हें खास तौर पर कम प्रदूषण फैलाने के लिए बनाया गया है। इन्हें बनाने में कम सामग्री का इस्तेमाल होता है और इनमें ऐसे रसायन मिलाए जाते हैं जो धूल को कम करते हैं।
प्रदूषण में कितनी कमी?
इन पटाखों से कम से कम 30% कम कण (PM) निकलते हैं। या फिर, 20% कम कण और 10% कम जहरीली गैसें (SO₂, NO₂) निकलती हैं।
शोर कितना कम?
इनका शोर 4 मीटर की दूरी पर 125 डेसिबल से कम होता है।
सामग्री में क्या अंतर है?
पारंपरिक पटाखों की तुलना में ग्रीन क्रैकर्स में कम हानिकारक चीजें होती हैं। - एल्युमीनियम: पारंपरिक पटाखों में 34% होता है, ग्रीन क्रैकर्स में 29% (14% कम)। - सल्फर: पारंपरिक पटाखों में 9% होता है, ग्रीन क्रैकर्स में 5% (44% कम)। - पोटेशियम नाइट्रेट: पारंपरिक पटाखों में 57% होता है, ग्रीन क्रैकर्स में 28% (50% कम)।
कीमत और प्रदूषण में अंतर:
ग्रीन क्रैकर्स सस्ते भी होते हैं। ये करीब 95 रुपये के मिलते हैं, जबकि पारंपरिक पटाखे 132 रुपये के। ये कणों (PM) का उत्सर्जन कम से कम 30% कम करते हैं।
ग्रीन क्रैकर्स कैसे पहचानें?
पैकेट पर CSIR-NEERI और PESO का हरा लोगो देखें। हर पटाखे पर एक QR या एन्क्रिप्टेड कोड भी होता है, जिससे उसकी पहचान की जा सकती है।
पटाखों में कौन से रसायन सेहत के लिए खतरनाक हैं?
पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रसायन और उनके सेहत पर असर: - काला बारूद (Black powder): इससे अस्थमा के दौरे पड़ सकते हैं, दिल का दौरा, स्ट्रोक और दिल व फेफड़ों की पुरानी बीमारियां हो सकती हैं। - रंग देने वाले रसायन (Colouring agents): - एल्युमीनियम: इससे त्वचा में एलर्जी हो सकती है और यह शरीर में जमा हो सकता है। - स्ट्रोंटियम: इससे फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। - बेरियम धुआं: यह जहरीला होता है और जलन पैदा करता है। - कॉपर: इससे कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। - ऑक्सीडाइजिंग एजेंट (Oxidising agents): - नाइट्रेट्स, क्लोरेट्स या परक्लोरेट्स: ये पौधों और जानवरों के लिए जहरीले होते हैं। ये पेट में पल रहे बच्चों और बच्चों के लिए भी खतरनाक हैं। - रिड्यूसिंग एजेंट (Reducing agents) (सल्फर): - यह एसिड रेन (अम्लीय वर्षा) का कारण बनता है और इससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। - बाइंडर्स (Binders) (डेक्सट्रिन, गोंद, कागज): - इनसे आंखें, नाक और मुंह में जलन हो सकती है। सिरदर्द, मतली और उल्टी हो सकती है। ये लिवर, किडनी और दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुछ तो कैंसर से भी जुड़े हैं।
विशेषज्ञों की चिंताएं:
दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) के एक अध्ययन में पाया गया कि ग्रीन क्रैकर्स से भी बहुत बारीक कण निकलते हैं। ये कण PM2.5 और PM10 से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन पटाखों से भी हानिकारक धुआं निकलता है, इसलिए इन्हें पूरी तरह "ग्रीन" कहना सही नहीं है।
पारंपरिक पटाखों से प्रदूषण (1-6 फीट की ऊंचाई पर PM2.5):
अलग-अलग तरह के पटाखे हवा में अलग-अलग मात्रा में PM2.5 छोड़ते हैं, जो हवा की गुणवत्ता और सेहत को प्रभावित करते हैं। - स्नेक टैबलेट (Snake tablet): यह करीब 3 मिनट जलता है और 64,500 µg/m³ PM2.5 छोड़ता है। - लड़ी (Garland - 1,000 Ladis): यह 6 मिनट जलती है और 38,450 µg/m³ PM2.5 छोड़ती है। - पुल पुल (Pul Pul): यह 3 मिनट जलता है और 28,950 µg/m³ PM2.5 पैदा करता है। - फुलझड़ी (Sparkler - Fuljhadi): यह 3 मिनट जलती है और 10,390 µg/m³ PM2.5 छोड़ती है। - चकरी (Ground spinner - Chakri): यह 5 मिनट जलती है और 9,490 µg/m³ PM2.5 छोड़ती है। - अनार (Flower pot - Anar): यह 5 मिनट जलता है और 4,860 µg/m³ PM2.5 पैदा करता है।
दिल्ली में दिवाली के दौरान हवा की गुणवत्ता (AQI) के रुझान:
- 2015–2016: जब पटाखों पर कोई प्रतिबंध नहीं था, दिवाली से एक दिन पहले PM2.5 का स्तर 353–421 µg/m³ था। दिवाली के दिन यह 343–319 µg/m³ रहा और दिवाली के अगले दिन 360–403 µg/m³ तक पहुंच गया। - 2017–2018: 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में पटाखों पर पहली बार प्रतिबंध लगाया और 2018 में ग्रीन क्रैकर्स पेश किए गए। इससे प्रदूषण थोड़ा कम हुआ। दिवाली से पहले PM2.5 का स्तर 315–321 µg/m³ था, दिवाली के दिन 319–337 µg/m³ रहा और अगले दिन 368–400 µg/m³ तक पहुंच गया। - 2019: ग्रीन क्रैकर्स केवल रात 8 बजे से 10 बजे के बीच जलाने की अनुमति थी। इतने कम समय के बावजूद, प्रदूषण बढ़ गया। दिवाली से एक दिन पहले PM2.5 374 µg/m³ था, दिवाली के दिन 414 µg/m³ और अगले दिन 435 µg/m³ तक पहुंच गया। - 2020–2024: पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन इसका पालन ठीक से नहीं हुआ। दिवाली से पहले PM2.5 का स्तर 307–414 µg/m³ रहा, दिवाली के दिन 312–414 µg/m³ और अगले दिन 303–435 µg/m³ तक रहा। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों का प्रदूषण कम करने में ज्यादा असर नहीं हुआ।