बुद्धू भगत का जन्म 17 जनवरी 1792 को रांची के सिलाई गांव में हुआ था। बचपन से ही वह साहसी और चतुर थे। तीर-धनुष से सटीक निशाना लगाना उनकी पहचान बन चुका था। उस समय अंग्रेज आदिवासियों पर अत्याचार कर रहे थे। युवा बुद्धू ने स्थिति को समझा और अपने साथियों से कहा- ‘जंगल हमारा साथी है, हम पेड़ों की आड़ लेकर अंग्रेजों पर हमला कर सकते हैं।’ उनकी रणनीति सफल रही। धीरे-धीरे बुद्धू भगत अंग्रेजों के लिए चुनौती बन गए। उन्होंने आसपास के गांवों को संगठित कर पत्थर, तीर, तलवार और गुलेल इकट्ठा किए। 1832 में उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजों पर तीरों और पत्थरों की वर्षा कर दी, जिससे अंग्रेज घबरा उठे। उन्हें पकड़ने के कई प्रयास असफल रहे। अंततः अंग्रेज कप्तान इम्पे बड़ी ताकत के साथ पहुंचा। सीमित संसाधनों के बावजूद बुद्धू और उनके साथी डटे रहे। लेकिन गोला-बारूद के सामने उनके हथियार टिक न सके। 14 अप्रैल 1832 को वे अपने लगभग डेढ़ सौ साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।

