हिमंत क्यों कर रहे हैं ‘मियां मुस्लिम’ का ज़िक्र

नवभारत टाइम्स

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के 'मियां मुस्लिम' पर दिए बयान चर्चा में हैं। आगामी चुनावों के चलते उनके भाषण आक्रामक हो रहे हैं। मुख्यमंत्री ने मताधिकार छीनने की बात कही है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य में मतदाता सूची की विशेष समीक्षा पर भी चिंता जताई जा रही है।

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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इन दिनों अपने ' मियां मुस्लिम ' वाले बयानों से खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं। उनके ये बयान न सिर्फ राजनीतिक गरमागरमी बढ़ा रहे हैं, बल्कि विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी संवैधानिक मूल्यों और समाज की एकता पर सवाल उठाने पर मजबूर कर रहे हैं। असम में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री के तेवर और भी आक्रामक हो गए हैं।

मुख्यमंत्री ने तो यहाँ तक कह दिया है कि 'मियां लोगों' को भारत में वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी निर्देश दिया है कि 'मियां लोगों को इतना परेशान करो कि वे राज्य से बाहर चले जाएं।' इस पर विपक्ष ने तीखा हमला बोला है। सवाल उठ रहे हैं कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति अगर किसी खास समुदाय को इस तरह निशाना बनाएगा, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए कितना खतरनाक है। दरअसल, असम में 'मियां' शब्द का इस्तेमाल बांग्लादेश से आए बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों के लिए किया जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता मिर्जा लुत्फुर रहमान बताते हैं कि भले ही 'मियां' शब्द का मतलब भाषा के हिसाब से 'जेंटलमैन' हो, लेकिन असम में इसका इस्तेमाल एक खास समुदाय को अपमानित करने के लिए किया जा रहा है। 2016 में जब असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की प्रक्रिया चल रही थी, तब 'मियां बोली' में कई कविताएँ लिखी गईं। इन कविताओं का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ, जिस पर काफी विवाद हुआ था। लेकिन मियां समुदाय ने इन कविताओं को अपनी पहचान और अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक बना लिया।

इसके अलावा, असम में 'D-Voter' यानी डाउटफुल वोटर का मुद्दा पहले से ही हजारों परिवारों के लिए खौफ का सबब बना हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में धुबरी सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार फारुख की माँ ताहिमीना खातून वोट नहीं डाल पाईं, क्योंकि उनके नाम के आगे लिस्ट में 'D' लिखा था। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ सालों से वोट देते आ रहे लोगों को अचानक संदिग्ध करार दे दिया गया।

फिलहाल असम में मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया चल रही है। इस पर भी चिंता जताई जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी असमिया अस्मिता और घुसपैठ को एक बड़ा मुद्दा बना रही है। पिछले हफ्ते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में कहा था कि राज्य के 7 जिलों पर 64 लाख घुसपैठियों का दबदबा है।

गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि घुसपैठ रोकना सिर्फ BJP के बस की बात है। उन्होंने कहा कि धुबरी, बारपेटा, दर्रांग, मोरीगांव, बोंगाईगांव, नागांव और गोलपाड़ा जैसे सात जिले घुसपैठियों से भरे पड़े हैं। अगर आप घुसपैठ रोकना चाहते हैं, तो फिर BJP की सरकार बनाएँ। मुख्यमंत्री भी अपने बयानों से लगातार बांग्लादेशी मूल के मुस्लिमों को निशाना बना रहे हैं। इससे लोगों में यह डर है कि कहीं वोटर लिस्ट से उनका नाम कटने पर उन्हें NRC में जोड़ दिया जाएगा और उनकी नागरिकता पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे।

2011 की जनगणना के मुताबिक, असम में मियां मुस्लिमों की आबादी 80 लाख से ज्यादा है। पहले करीब 40 विधानसभा सीटों पर इनका प्रभाव था, लेकिन डीलिमिटेशन (निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन) के बाद यह संख्या घटकर करीब 20-22 सीटों तक सिमट गई है। यह पूरा मामला असम की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है, जहाँ चुनावी समीकरणों के बीच समुदाय विशेष को निशाना बनाने का आरोप लग रहा है।