Why Are Emotions Hurt By Seeing Status Controversy Over The Word Baba In Kotdwar
हैसियत देखकर क्यों आहत होती हैं भावनाएं
नवभारत टाइम्स•
कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार के 'बाबा' शब्द के प्रयोग पर विवाद खड़ा हो गया है। बजरंग दल ने इसका विरोध किया है। मोहम्मद दीपक नाम के व्यक्ति ने दुकानदार का समर्थन किया है। इस घटना ने भावनाओं और अधिकारों पर बहस छेड़ दी है। पुलिस ने कई मामले दर्ज किए हैं।
उत्तराखंड के कोटद्वार में 'बाबा' शब्द के इस्तेमाल को लेकर एक मुस्लिम दुकानदार मोहम्मद दीपक और बजरंग दल के बीच उपजा विवाद अब तूल पकड़ता जा रहा है। यह मामला तब सामने आया जब बजरंग दल के कुछ लोगों ने एक बुजुर्ग दुकानदार पर अपनी दुकान से 'बाबा' शब्द हटाने का दबाव बनाया। इसके जवाब में मोहम्मद दीपक ने विरोध जताया और कहा कि उन्हें अपने अंजाम का डर नहीं है और जरूरत पड़ने पर वे ऐसा दोबारा करेंगे। यह घटना 26 जनवरी को हुई, जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ था और जिसने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं। लेकिन, इस मामले में कानून और अधिकार 'भावनाओं' के सामने फीके पड़ते दिख रहे हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि एक मुस्लिम दुकानदार 'बाबा' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि यह उनके धर्म का नहीं है और इससे उनकी भावनाएं आहत होती हैं।
'बाबा' शब्द का मतलब हर जगह अलग-अलग है। एक बेटे के लिए बाबा पिता होते हैं, तो पोते के लिए दादा। बनारस में तो सिर्फ काशी विश्वनाथ को 'बाबा' कहा जाता है, और संगम तट पर लगने वाले मेले को 'बाबाओं का मेला'। भाषा, संस्कृति या भूगोल बदल जाए, लेकिन 'बाबा' शब्द से जुड़ा अपनापन और सम्मान का भाव हमेशा बना रहता है। यह शब्द भारत से लेकर मध्य एशियाई सभ्यताओं तक में पाया जाता है, चाहे वह रिश्तों में हो, सूफी संतों के रूप में हो, भगवा धारण किए हुए लोगों में हो या फिर किसी खास शख्सियत के लिए। इस पर किसी का कॉपीराइट नहीं है। लेकिन उत्तराखंड के कोटद्वार में अब इसी 'बाबा' शब्द को लेकर लड़ाई छिड़ गई है।मोहम्मद दीपक के नाम से सोशल मीडिया पर पिछले एक हफ्ते से खूब चर्चा हो रही है। इस मामले पर लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग दीपक का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ उनके खिलाफ हैं। विरोध करने वाले उन्हें चुनौती दे रहे हैं, जबकि दीपक का कहना है कि उन्हें किसी बात का डर नहीं है और अगर जरूरत पड़ी तो वे फिर से ऐसा करेंगे। उन्होंने ऐसा क्या किया, यह तब सामने आया जब बजरंग दल से जुड़े कुछ लोग एक बुजुर्ग दुकानदार पर अपनी दुकान से 'बाबा' शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे। दीपक ने इसका विरोध किया।
यह एक संयोग ही है कि यह घटना 26 जनवरी को हुई, जिस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था। संविधान ने देश के सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और कानूनी सुरक्षा दी है। लेकिन इस मामले में, ऐसा लग रहा है कि सारे कानून और अधिकार लोगों की 'भावनाओं' के आगे हार मान रहे हैं। जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनका मानना है कि एक मुस्लिम दुकानदार 'बाबा' शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि यह उनके धर्म से जुड़ा नहीं है और इससे उनकी भावनाएं आहत होती हैं। किसी की भावनाएं आहत करना वाकई गलत है, लेकिन आजकल भावनाएं भी हैसियत देखकर आहत होने लगी हैं।
सवाल यह है कि क्या सही है और क्या गलत। लोगों की भावनाएं तब आहत क्यों नहीं होतीं, जब इसी उत्तराखंड में अंकिता भंडारी केस में वीआईपी एंगल की जांच के लिए विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है? जब गंदे पानी से आम लोग मर रहे होते हैं और मंत्री कहते हैं 'घंटा', तब भी भावनाओं को फर्क नहीं पड़ता। 'शंकराचार्य विवाद' से भी तो भावनाएं आहत होनी चाहिए थीं, और जब डॉनल्ड ट्रंप बार-बार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, तब भी। लेकिन ये मामले भावनाओं के खेल से कहीं ज्यादा बड़े थे।
कोटद्वार मामले में पुलिस ने तीन केस दर्ज किए हैं। इनमें से एक केस दीपक और उनके दोस्त के खिलाफ भी है। दीपक को यह समझ नहीं आ रहा कि उनके खिलाफ एफआईआर क्यों हुई है, ठीक वैसे ही जैसे उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने गलत क्या किया है। उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन जिस तरह के विरोध और गुस्से का उन्हें सामना करना पड़ रहा है, उसके बाद यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर कौन सही को सही कहने की हिम्मत करेगा। यह मामला सिर्फ एक शब्द के इस्तेमाल का नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी है कि हमारे समाज में कानून और भावनाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।