AI बुद्धिमान है, पर हमारे जितना नहीं

नवभारत टाइम्स

एआई इंटेलिजेंस के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह निबंध लिख सकता है, कोड बना सकता है और बीमारियों का निदान भी सुझा सकता है। हालांकि, मानव बुद्धि की सामाजिकता, अनुभव और नैतिकता की गहराई एआई में नहीं है। एआई केवल डेटा पर आधारित है, जबकि मानव बुद्धि 8 अरब लोगों के जीवन अनुभव से बनती है।

ai is intelligent but not like humans know why
नई दिल्ली में चल रहे AI Impact Summit के बीच यह सवाल गहरा गया है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वाकई इंसानी बुद्धि के करीब पहुंच रहा है। लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) और जेनरेटिव AI की प्रभावशाली प्रगति के बावजूद, AI की तुलना इंसानों से करने का मौजूदा तरीका गलत धारणाओं पर आधारित है। यह लेख बताता है कि AI की बुद्धि को केवल परीक्षा या टास्क पास करने की क्षमता तक सीमित करना, उसकी सामाजिक, शारीरिक और नैतिक गहराई को नजरअंदाज करना है। असली खतरा AI के अचानक सुपर-इंटेलिजेंट बनने का नहीं, बल्कि इस शोर में वास्तविक मुद्दों जैसे पक्षपात, ताकत का केंद्रीकरण और समावेशी तकनीक की जरूरत से ध्यान भटकने का है।

AI की दुनिया में इन दिनों AI Impact Summit के चलते खूब चर्चाएं हो रही हैं। हर कोई AI की बढ़ती ताकत के बारे में बात कर रहा है। हमें बार-बार याद दिलाया जा रहा है कि AI जल्द ही इंसानों की बुद्धि को पीछे छोड़ देगा और सुपर-इंटेलिजेंस का दौर शुरू हो जाएगा। इससे हमारे समाज का हर हिस्सा बदलने वाला है। लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) और जेनरेटिव सिस्टम, यानी AI जो नई चीजें बना सकता है, वाकई कमाल के हैं। ये AI अब निबंध लिख सकते हैं, भाषाओं का अनुवाद कर सकते हैं, कंप्यूटर के लिए कोड बना सकते हैं, बीमारियों का पता लगाने में मदद कर सकते हैं और यहां तक कि संगीत भी रच सकते हैं। कुछ मामलों में तो मशीनें इंसानों से भी आगे निकल सकती हैं।
लेकिन, असली सवाल यह है कि क्या AI सचमुच इंसानी बुद्धि के करीब पहुंच रहा है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हम 'बुद्धि' किसे कहते हैं। आज AI और इंसानों की जो तुलना की जा रही है, वह एक गलत सोच पर आधारित है। यह मान लिया गया है कि बुद्धि सिर्फ दिमाग की वह ताकत है जिसे परीक्षा या किसी काम से मापा जा सकता है। अगर कोई मशीन परीक्षा पास कर ले या कोई अच्छा तर्क लिख दे, तो हम मान लेते हैं कि वह इंसान जितनी ही समझदार हो गई है। यह सोच पुरानी IQ टेस्ट जैसी है, जिसकी बहुत आलोचना भी हुई है। जब हम बुद्धि को मापने वाली कुछ चीजों तक ही सीमित कर देते हैं, तो मशीनों के लिए इंसानों की बराबरी करना आसान हो जाता है।

दरअसल, इंसानी बुद्धि कोई अकेली प्रतिभा नहीं है, यह तो सामाजिक है। चाहे कोई वैज्ञानिक खोज हो या कला के क्षेत्र में कोई बड़ी क्रांति, हर इंसानी उपलब्धि लोगों के सामूहिक प्रयास का नतीजा होती है। कोई भी वैज्ञानिक अकेले काम नहीं करता। हर खोज के पीछे कई लोगों के तरीके, उनकी समीक्षाएं, संस्थान और पीढ़ियों का जमा किया हुआ ज्ञान होता है। हमारी परंपराएं भी इसी तरह चलती आ रही हैं और भाषा तो खुद में एक सामूहिक उपलब्धि है।

कलेक्टिव इंटेलिजेंस, यानी सामूहिक बुद्धि पर हुई रिसर्च बताती है कि अगर लोग आपस में अच्छे से बात करें और सहयोग करें, तो एक समूह के लोग मिलकर अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा अच्छा काम कर सकते हैं। कई बार उनका सामूहिक काम उनके सबसे होशियार सदस्य से भी बेहतर होता है। हमारी बुद्धि हमारे परिवारों, समुदायों, संस्थाओं और संस्कृतियों में बसती है। AI ऐसी किसी सामूहिक दुनिया का हिस्सा नहीं है। वह किसी समाज में नहीं रहता, जहां लोग एक-दूसरे की मदद करते हों। वह सिर्फ डेटा के आधार पर जवाब देता है। इसमें कोई समझ, कोई इरादा या कोई जिम्मेदारी नहीं होती।

इंसान की बुद्धि उसके शरीर और अनुभवों से जुड़ी होती है। हम बचपन से चीजों को छूकर, चलकर, देखकर और दूसरों की नकल करके सीखते हैं। हमारी भावनाएं, हमारे अनुभव और हमारा समाज मिलकर हमारी सोच को आकार देते हैं। लेकिन, AI के पास न तो शरीर है और न ही असली अनुभव। वह सिर्फ बहुत सारे डेटा से शब्दों के पैटर्न सीखता है। वह इंसानों की तरह चीजों को समझता नहीं है, बस गणना करता है। उसे डर, खुशी या सहानुभूति महसूस नहीं होती। वह समाज में रहकर नियम नहीं सीखता। यह कमी खासकर नैतिक मामलों में साफ दिखती है। इंसान सही और गलत का फैसला अपने इतिहास, संस्कृति और समाज के आधार पर करता है, जबकि मशीनें अपने ट्रेनिंग डेटा के आधार पर।

एक और बात है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। AI जिस डेटा से सीखता है, वह पूरी मानवता का बहुत छोटा सा हिस्सा है। दुनिया में 7,000 से ज्यादा भाषाएं हैं, लेकिन इंटरनेट पर ज्यादातर सामग्री सिर्फ कुछ बड़ी भाषाओं में ही मिलती है। करीब 80% सामग्री तो सिर्फ 10 भाषाओं में है। संस्कृतियां, मौखिक परंपराएं और बहुत सारा ज्ञान तो मशीन की पहुंच से बाहर ही है। इतने सीमित डेटा पर प्रशिक्षित AI मॉडल इसीलिए एक छोटी आबादी से जुड़े परिणाम ही दिखाते हैं। इसके विपरीत, मानव बुद्धि 8 अरब लोगों के जीवन के अनुभवों से बनी है। मशीन की इस विविधता तक सीधी पहुंच नहीं है। वह इंसानों द्वारा बनाए गए डेटा पर ही निर्भर है, लेकिन यह डेटा भी सीमित है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हम उपलब्ध ट्रेनिंग डेटा की सीमाओं तक पहुंचने वाले हैं।

लेकिन, इन सब बातों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि AI बेकार है। इसने पहले ही दुनिया को बहुत बदल दिया है। असली खतरा यह नहीं है कि मशीनें अचानक से इंसानों को पीछे छोड़ देंगी। असली खतरा यह है कि कहीं इस शोर-शराबे में हम उन वास्तविक मुद्दों से भटक न जाएं जो हमारे सामने हैं। ये मुद्दे हैं - ऑटोमेटेड सिस्टम में होने वाला पक्षपात, ताकत का कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित होना, मजदूरों का विस्थापन, और ऐसी तकनीक की जरूरत जो नियमों के दायरे में हो और सभी के लिए समावेशी हो।

लेखिका वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी में लैंग्वेज लैब की डायरेक्टर और जेनरेटिव AI थिंक टैंक की डिप्टी हेड हैं।

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