सबका हित

नवभारत टाइम्स

सबका हित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट समावेशी तकनीक पर केंद्रित है। विकसित और विकासशील देशों की चिंताएं अलग हैं। भारत को आत्मनिर्भरता और निजी क्षेत्र की भागीदारी की जरूरत है। समिट से निजी क्षेत्र का उत्साह बढ़ने की उम्मीद है। यह आयोजन देश में एआई को लेकर हलचल पैदा कर रहा है।

ais sabka hit indias step towards inclusive technology and self reliance
नई दिल्ली में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट का मुख्य एजेंडा 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' है, जिसका मतलब है ऐसी AI तकनीक जो सबके लिए फायदेमंद हो। इस समिट में दुनिया भर के नेता और टेक दिग्गज शामिल हो रहे हैं, जिनमें पीएम नरेंद्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्राजील के प्रेसिडेंट लूला डी सिल्वा प्रमुख हैं। यह समिट विकसित और विकासशील देशों के बीच AI तक पहुंच के अंतर को पाटने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है।

यह समिट इस बात पर प्रकाश डाल रहा है कि कैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर विकसित और विकासशील देशों की चिंताएं अलग-अलग हैं। जहां विकसित देश AI के संभावित खतरों और इसके प्रभाव पर चर्चा कर रहे हैं, वहीं विकासशील देश अभी भी इस तकनीक तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह 'ग्लोबल नॉर्थ' और 'ग्लोबल साउथ' के बीच पहले से मौजूद आर्थिक खाई को और बढ़ा सकता है। AI में इन दोनों के बीच की दूरी को कम करने की क्षमता है, लेकिन यह तभी संभव है जब तकनीक सभी के लिए सुलभ हो। नई दिल्ली में हो रहा यह समिट इसी महत्वपूर्ण मुद्दे को उठा रहा है। इस अंतर को समझते हुए, माइक्रोसॉफ्ट ने इस दशक के अंत तक ग्लोबल साउथ में 50 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है।
सुरक्षा भी इस समिट का एक अहम विषय है, और आत्मनिर्भरता इसी से जुड़ी हुई है। हालांकि, इस क्षेत्र में भारत को अभी काफी आगे जाना है। भारत के पास हुनर ​​तो है, लेकिन मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। मशीन लर्निंग के लिए डेटा उपलब्ध है, लेकिन दुनिया का मुकाबला करने लायक अपना AI मॉडल अभी तक नहीं बन पाया है।

भारत को इस दिशा में निजी क्षेत्र की भागीदारी की सख्त जरूरत है। वर्तमान में, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 0.7% अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च करता है, जबकि चीन और अमेरिका जैसे देश 2.5% से 3% तक खर्च करते हैं। इस बड़े अंतर का एक मुख्य कारण निजी क्षेत्र की उदासीनता है। भारत में नवाचार (Innovation) काफी हद तक सरकार पर निर्भर है, और निजी क्षेत्र केवल एक तिहाई योगदान दे रहा है। उम्मीद है कि यह समिट निजी क्षेत्र को AI के क्षेत्र में आगे आने और अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करेगा।

इस आयोजन ने देश में AI को लेकर एक नई हलचल जरूर पैदा की है, लेकिन कुछ कमियां भी सामने आई हैं। पहले दिन हुई अव्यवस्था पर सरकार को सफाई देनी पड़ी, जिससे वैश्विक महत्व के आयोजन की तैयारियों पर सवाल उठे। हालांकि, इन सब के बीच भारत को AI पर अपने लक्ष्य को याद रखना होगा और समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

AI एक ऐसी तकनीक है जो हमारे जीवन को कई तरह से बदल सकती है। यह स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कृषि और परिवहन जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकती है। उदाहरण के लिए, AI का उपयोग बीमारियों का जल्दी पता लगाने, व्यक्तिगत शिक्षा प्रदान करने, फसलों की पैदावार बढ़ाने और यातायात को सुचारू बनाने के लिए किया जा सकता है। लेकिन, जैसा कि समिट में चर्चा हुई, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि AI का लाभ सभी को मिले, न कि केवल कुछ चुनिंदा लोगों को।

विकसित देशों की चिंताएं AI के दुरुपयोग, जैसे कि नौकरियों का नुकसान या गलत सूचना का प्रसार, पर केंद्रित हैं। वहीं, विकासशील देशों के लिए मुख्य चुनौती यह है कि वे इस तकनीक को कैसे अपनाएं और इसका उपयोग अपने नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कैसे करें। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे साधना होगा।

भारत जैसे देश के लिए, AI में अपार संभावनाएं हैं। हमारे पास एक बड़ी युवा आबादी है जो नई तकनीकों को सीखने और अपनाने में सक्षम है। अगर हम सही इंफ्रास्ट्रक्चर और नीतियों का निर्माण करते हैं, तो हम AI के क्षेत्र में एक वैश्विक नेता बन सकते हैं। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता होगी।

यह समिट एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह केवल शुरुआत है। AI का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते हम इसे सभी के लिए सुलभ और फायदेमंद बनाने का प्रयास करें। 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' का सिद्धांत AI के विकास में मार्गदर्शक होना चाहिए।

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