माइडस टच से लीडिया तक, बदला गोल्ड

नवभारत टाइम्स

राजा माइडस की कहानी से धन और मूल्य की समझ मिलती है। लीडिया सभ्यता ने सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व सिक्कों का आविष्कार किया। इन सिक्कों ने व्यापार को आसान और भरोसेमंद बनाया। इसने प्राचीन अर्थव्यवस्था को बदला और लोगों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के अवसर दिए। सिक्कों ने लेन-देन को सुगम बनाया और बाजार का विस्तार किया।

from midas touch to lydia the historical journey of golds value and economy
राजा माइडस की सोने की छुअन की कहानी, जिसने सब कुछ सोना बना दिया, हमें धन, मूल्य और अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत कुछ सिखाती है। यह कहानी बताती है कि कैसे प्राचीन काल में, खासकर लीडिया सभ्यता में, सिक्कों का आविष्कार हुआ और कैसे इसने व्यापार को आसान बनाया, लोगों की सोच बदली और सामाजिक व्यवस्था में क्रांति ला दी। यह यात्रा हमें सिखाती है कि असली मूल्य सिर्फ धातु में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास में छिपा है और सोना तब तक वरदान है जब तक वह जीवन को आसान बनाए, न कि मुश्किल।

प्राचीन फ्रिजिया के राजा माइडस को देवता डायोनिसस से एक ऐसा वरदान मिला कि वह जिस भी चीज़ को छुए, वह सोने की बन जाए। शुरुआत में तो राजा बहुत खुश हुए, लेकिन जल्द ही यह वरदान उनके लिए एक अभिशाप बन गया। वे न तो कुछ खा-पी सकते थे और न ही अपनी प्यारी बेटी को गले लगा सकते थे, क्योंकि वह भी सोने की बन गई थी। तब देवता ने उन्हें पैक्टोलस नदी में स्नान करने की सलाह दी, जिससे यह वरदान खत्म हो गया। कहते हैं कि इसी स्नान के बाद से पैक्टोलस नदी में सोने जैसी चमक आ गई। असल में, उस नदी में इलेक्ट्रम नाम का एक मिश्र धातु था, जिसे सफेद सोना भी कहा जाता था।
सोने-चांदी के सिक्कों का इतिहास बेबीलोन से शुरू होता है, जहाँ लोग सोने का इस्तेमाल सिर्फ सजावटी सामान के लिए करते थे। बाद में, इसी सोने को सजावटी वस्तु से बदलकर मुद्रा का रूप दिया गया। करीब 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व, बेबीलोन के पास रहने वाली लीडिया सभ्यता ने सिक्कों का आविष्कार किया। ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस (Herodotus) बताते हैं कि लीडिया के लोगों ने ही सबसे पहले सोने-चांदी के सिक्कों का इस्तेमाल शुरू किया था।

सुमेर सभ्यता में भी सोना मुख्य रूप से गहने या जमा करने के लिए ही इस्तेमाल होता था। लेकिन लीडिया के लोगों ने इसमें एक बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने इलेक्ट्रम धातु को पिघलाकर सिक्के बनाए और उन पर शाही मुहर लगाई। यह मुहर सिक्के के वजन और उसकी शुद्धता की गारंटी होती थी। इससे व्यापार करना न सिर्फ आसान हो गया, बल्कि भरोसेमंद भी बन गया। अब सिक्कों को सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक माना जाने लगा।

प्राचीन अर्थव्यवस्था काफी हद तक 'टॉप डाउन' यानी ऊपर से नीचे की ओर चलती थी। इसका मतलब था कि राजा और अमीर लोग ही सारे संसाधनों पर नियंत्रण रखते थे। किसान अनाज उगाते थे और टैक्स भरते थे, लेकिन व्यापार पर कुछ गिने-चुने व्यापारियों का ही कब्जा होता था। सिक्कों के आने से 'बॉटम अप' यानी नीचे से ऊपर की ओर चलने वाली व्यवस्था शुरू हुई। अब जिसके पास सिक्के होते थे, वह बाजार में उतर सकता था और अपना सामान बेच या खरीद सकता था।

इस बदलाव ने समाज की तस्वीर ही बदल दी। अगर कोई गरीब परिवार में पैदा हुआ है, तो यह जरूरी नहीं था कि वह हमेशा गरीब ही रहेगा। सिक्कों ने, भले ही थोड़ी सी ही सही, लेकिन अवसरों के द्वार खोल दिए। लोग पैसा कमाकर अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को सुधार सकते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि लीडिया की राजधानी सार्डिक एक बड़ा कारोबारी केंद्र बन गई, जहाँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सभी रास्ते आकर मिलते थे।

इसके बाद, गिजेस और क्रीसस जैसे लीडिया के राजाओं ने सिक्कों को एक मानक (standard) बना दिया। इससे मुद्रा और सरकार के बीच का रिश्ता और मजबूत हुआ। सरकारें अब खुद मुद्रा जारी करने लगीं और जनता उसे स्वीकार करने लगी। यही मॉडल कुछ समय बाद यूनान, रोम और दुनिया के लगभग सभी आधुनिक देशों ने अपनाया। इससे लेन-देन को लेकर होने वाले झगड़े कम हो गए। व्यापारियों को भी हर बार सोना तौलने की झंझट से मुक्ति मिल गई। इससे बाजार और भी व्यवस्थित हो गया और उसका विस्तार हुआ।

सिक्कों ने सिर्फ व्यापार को ही नहीं बदला, बल्कि लोगों की सोच को भी बदल दिया। राजा माइडस की सोने की छुअन से लेकर लीडिया के सिक्कों तक की यह यात्रा मानव सभ्यता के विकास की कहानी कहती है। यह हमें सिखाती है कि असली मूल्य सिर्फ धातु में नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास में छिपा होता है। माइडस टच की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि सोना तब तक वरदान है जब तक वह जीवन को आसान बनाता है। लेकिन जैसे ही वह जीवन को मुश्किल या जड़ बना देता है, वह एक श्राप बन जाता है।

रेकमेंडेड खबरें