Saints Signs And Polices Baton A Unique Confluence Of Social Reform
जो संत के संकेत नहीं समझते, उन्हें बेंत खानी पड़ती है
Contributed by: संत जैनमुनि तरुण सागरजी|नवभारत टाइम्स•
संत और पुलिस दोनों समाज सुधार का काम करते हैं। संत संकेतों से समझाते हैं, वहीं पुलिस बेंत से। जो संत के इशारे नहीं समझते, उन्हें पुलिस की लाठी की जरूरत पड़ती है। दान-पुण्य एकांत में करना चाहिए। पुण्य छिपाने से बढ़ता है। संत का आगमन भाग्य है। हर कोई असंतुष्ट है, अमीर गरीब बनना चाहता है और गरीब अमीर।
संत और पुलिस , दोनों ही समाज को बेहतर बनाने का काम करते हैं, बस उनका तरीका अलग है। संत इशारों में समझाते हैं, वहीं पुलिस डंडे का इस्तेमाल करती है। जो संत की बातों को नहीं समझते, उन्हें ही पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ता है। पुलिस की वर्दी भी भगवा वस्त्रों की तरह ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह विश्वास का प्रतीक है। अगर वर्दी वाला भ्रष्ट हो जाए, तो वह वर्दी के सम्मान को ठेस पहुंचाता है।
दान और पुण्य का काम हमेशा अकेले में करना चाहिए। जैसे हम नहाने के लिए बाथरूम का इस्तेमाल करते हैं, न कि सड़क पर, वैसे ही दान-पुण्य भी गुप्त रूप से करना चाहिए। पुण्य की खबर किसी को नहीं लगनी चाहिए। पुण्य छिपाने से बढ़ता है और बताने से खत्म हो जाता है। यह बहुत शर्मीला होता है। पुण्य और दान छपाकर नहीं, छिपाकर करना चाहिए। अगर आपके घर में कूड़ा जमा हो जाए, तो क्या आप उसका अखबार में इश्तेहार देते हैं?शहर में किसी संत का आना एक बड़ा सौभाग्य होता है। संत का आपके घर आना तो अहोभाग्य है। संत को याद करना सौभाग्य है। संत हमें याद करें, यह तो परम भाग्य है। और खुद संत बन जाना, यह तो महाभाग्य है। इतनी अच्छी बातें होने के बावजूद अगर हम न सुधरें, तो यह हमारा दुर्भाग्य है।
अमीर हो या गरीब, सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। गरीब सोचता है कि भूख लगने पर क्या खाए। वहीं अमीर सोचता है कि ऐसा क्या खाए जिससे भूख लगे। युवा हो या बूढ़ा, दोनों के सामने एक ही सवाल है। युवा के पास समस्या है कि क्या करें, समय ही नहीं मिलता। बूढ़े की समस्या है कि क्या करें, समय कटता ही नहीं। आम आदमी हो या खास, दोनों की जिंदगी में मुश्किलें हैं। आम आदमी सोचता है कि आज क्या पहने। खास आदमी सोचता है कि आज क्या-क्या पहने।
दुनिया में कोई भी इंसान पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है। गरीब अमीर बनना चाहता है, अमीर सुंदर दिखना चाहता है। कुंवारे शादी करना चाहते हैं और शादीशुदा लोग मौत का इंतजार करते हैं।
यह सब बातें हमें सिखाती हैं कि जीवन में संतोष बहुत जरूरी है। संत हमें सही रास्ता दिखाते हैं, और पुलिस हमें गलत काम करने से रोकती है। दोनों का मकसद एक ही है - समाज को बेहतर बनाना। लेकिन अगर हम खुद ही अपनी गलतियों को न समझें, तो फिर कोई भी हमें नहीं सुधार सकता। दान-पुण्य जैसी अच्छी बातें भी अगर दिखावे के लिए की जाएं, तो उनका कोई मतलब नहीं रह जाता। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनका ढिंढोरा पीटना चाहिए।
जीवन की हर अवस्था में, चाहे वह जवानी हो या बुढ़ापा, अमीरी हो या गरीबी, हर किसी के पास अपनी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का सामना हमें खुद ही करना पड़ता है। दूसरों की देखादेखी या दिखावे में पड़कर हम अपनी असली समस्याओं से दूर हो जाते हैं। इसलिए, हमें अपने अंदर झांकना चाहिए और समझना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं और क्या कर रहे हैं। तभी हम जीवन में सच्चा सुख और संतोष पा सकते हैं।