पौधरोपण के बाद रखरखाव करना भूले, सूखे पेड़

नवभारत टाइम्स

गुड़गांव की मातृ वन परियोजना पर सवाल उठ रहे हैं। बड़े पैमाने पर पौधे लगाने का अभियान चलाया गया था। अब कई जगहों पर पौधे सूखे मिल रहे हैं। समय पर सिंचाई और नियमित देखभाल न होने से यह स्थिति बनी है। पर्यावरणविदों का कहना है कि कंपनियों की सक्रियता कम हो गई है।

पौधरोपण के बाद रखरखाव करना भूले, सूखे पेड़
गुड़गांव शहर को हरा-भरा बनाने के लिए अगस्त में शुरू की गई 'मातृ वन परियोजना' अब सवालों के घेरे में है। बड़े पैमाने पर पौधे लगाने के इस अभियान को शहर की एक अहम पर्यावरण पहल बताया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि यह इलाका भविष्य में घने जंगल में बदल जाएगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। यह परियोजना कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत चल रही है, जिसमें पांच कंपनियां पौधे लगाने और उनकी देखभाल का काम देख रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि अब तक 30 हजार से ज़्यादा पौधे लगाए जा चुके हैं और 700 एकड़ में कुल डेढ़ लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है। मगर, कई जगहों पर सूखे डंडे ही नज़र आ रहे हैं, जिसकी वजह समय पर पानी न मिलना और नियमित देखभाल की कमी बताई जा रही है। कुछ जगहों पर पौधों के चारों ओर बाड़ तो है, पर अंदर पौधे मुरझाए या पूरी तरह सूख चुके हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि पौधे लगाने के बाद कंपनियों की सक्रियता कम हो गई है। कुछ जगहों पर तो कचरा भी फेंका जा रहा है, जिससे पौधों को और नुकसान हो रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सिर्फ पौधे लगाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें पेड़ बनने तक बचाना और उनकी देखभाल करना ही असली ज़िम्मेदारी है। वहीं, डीएफओ राज कुमार ने कहा कि 'माता वन' में पौधारोपण का काम CSR के तहत हो रहा है और संबंधित कंपनियां पांच साल तक पौधों की देखभाल करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कहीं पौधे सूखने की शिकायत मिली तो उसकी जांच कराई जाएगी।

यह परियोजना शहर को हरा-भरा बनाने के बड़े वादे के साथ शुरू हुई थी। इसका मकसद 700 एकड़ ज़मीन पर डेढ़ लाख पौधे लगाकर एक घना जंगल तैयार करना था। यह सब CSR फंड के ज़रिए हो रहा है, जिसमें कई बड़ी कंपनियां अपना योगदान दे रही हैं। हर कंपनी को पौधे लगाने और उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी दी गई है। अधिकारियों के मुताबिक, अब तक 30 हजार से ज़्यादा पौधे लगाए जा चुके हैं। लेकिन, जब ज़मीनी हकीकत देखी जाती है, तो तस्वीर कुछ और ही नज़र आती है। कई जगहों पर लगाए गए पौधे या तो सूखे हुए हैं या फिर सिर्फ डंडे बनकर रह गए हैं।
इसकी मुख्य वजह समय पर सिंचाई और नियमित देखभाल की कमी बताई जा रही है। लोगों का कहना है कि पौधे लगाने के बाद उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो रही है। कुछ जगहों पर पौधों के चारों ओर सुरक्षा के लिए घेरा तो बनाया गया है, लेकिन अंदर पौधे मुरझाए हुए या पूरी तरह से मर चुके हैं। पर्यावरणविदों ने भी इस बात पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पौधे लगाने के बाद कंपनियों की तरफ से जो सक्रियता दिखनी चाहिए थी, वह कम हो गई है। कुछ जगहों पर तो पौधों के बीच कचरा भी फेंका जा रहा है, जिससे उन्हें और नुकसान पहुँच रहा है।

पर्यावरण प्रेमियों का साफ कहना है कि सिर्फ पौधे लगा देना ही काफी नहीं है। असली काम तो उन्हें पेड़ बनने तक बचाना और उनकी लगातार देखभाल करना है। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसके लिए निरंतर प्रयास की ज़रूरत होती है।

इस मामले पर डीएफओ राज कुमार ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि 'माता वन' में पौधारोपण का काम CSR के तहत किया जा रहा है। उन्होंने यह भी साफ किया कि संबंधित कंपनियां अगले पांच सालों तक लगाए गए पौधों की देखरेख के लिए ज़िम्मेदार हैं। डीएफओ ने आश्वासन दिया कि अगर कहीं भी पौधे सूखने की शिकायत मिलती है, तो उसकी तुरंत जांच कराई जाएगी और ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे। यह परियोजना शहर के पर्यावरण को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी सफलता के लिए सभी हितधारकों को अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभानी होगी।