परिवहन समिति पर बीजेपी का दबदबा, शिवसेना को जगह नहीं देने पर बवाल

नवभारत टाइम्स

नवी मुंबई महानगर पालिका की महासभा में परिवहन समिति के सदस्यों की नियुक्ति को लेकर हंगामा हुआ। सत्ताधारी बीजेपी ने सभी 12 सदस्यों पर अपना कब्जा जमा लिया। शिवसेना को समिति में कोई जगह नहीं मिली। इससे नाराज शिवसेना ने विरोध प्रदर्शन किया और महासभा का बहिष्कार कर दिया।

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नवी मुंबई महानगर पालिका की पहली महासभा का दूसरा दिन हंगामे की भेंट चढ़ गया। सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के बीच परिवहन समिति में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर जमकर बहस हुई। आखिरकार, बीजेपी ने सभी 12 सीटों पर अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त कर शिवसेना को दरकिनार कर दिया। इससे नाराज शिवसेना ने महासभा में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। शिवसेना की महिला नगरसेवकों ने महापौर की कुर्सी के पास पहुंचकर घेराव किया, जिसके जवाब में बीजेपी की महिला नगरसेवकों ने भी महापौर का बचाव करने के लिए मोर्चा संभाला। कुछ देर के हंगामे के बाद शिवसेना ने महासभा का बहिष्कार कर दिया और सभी नगरसेवक पालिका से चले गए।

महासभा के दूसरे दिन की शुरुआत में परिवहन समिति के सदस्यों की नियुक्ति पर चर्चा शुरू हुई। इस दौरान, सभागृह नेता सागर नाईक ने 2007 के एक कानून का हवाला देते हुए कहा कि अगर परिवहन समिति के सदस्य पालिका के सदस्यों में से चुने जाते हैं, तो पार्टियों के अनुपात के अनुसार सदस्यों की नियुक्ति की जा सकती है। लेकिन, अगर बाहर के सदस्यों की नियुक्ति की जाती है, तो उन पर अनुपात का नियम लागू नहीं होगा और उनकी नियुक्ति मतदान से होगी।
इस पर शिवसेना के नगरसेवक किशोर पाटकर ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि 2017 में संग्राम जगताप बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि वोट कराकर समितियों के सदस्यों की नियुक्ति करना गैरकानूनी है। यह धारा 31-A (2) का उल्लंघन होगा। इसलिए, सदस्यों की नियुक्ति दलों की संख्या के अनुपात में ही होनी चाहिए। किशोर पाटकर के इस तर्क को सभागृह नेता सागर नाईक ने यह कहकर खारिज कर दिया कि हाईकोर्ट का वह निर्णय परिवहन समिति के बारे में नहीं था। इस पर किशोर पाटकर ने जोर देकर कहा कि वह निर्णय परिवहन समिति और स्थाई समिति दोनों के लिए था।

राजनीति और गरमाई। विपक्ष के नेता विजय चौगुले ने सभागृह नेता सागर नाईक के 2007 के कानून के उल्लेख पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि 2010 और 2015 में तो उस नियम का पालन नहीं किया गया था। उस समय सदस्यों की नियुक्ति दलों की संख्या के अनुपात में ही की गई थी। इस पर सागर नाईक ने जवाब दिया कि उन्हें तब इस कानून की जानकारी नहीं थी।

शिवसेना के नेता मनोज हल्दणकर ने कहा कि परिवहन समिति के सदस्यों का यह मुद्दा वे सबसे पहले नगरविकास मंत्रालय के पास ले जाएंगे। वे इस निर्णय पर स्टे (रोक) लगाने की मांग करेंगे। उन्हें पूरी उम्मीद है कि राज्य सरकार उन्हें उचित न्याय देगी।

यह पूरा मामला नवी मुंबई महानगर पालिका की पहली महासभा में सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी शिवसेना के बीच शक्ति प्रदर्शन का एक बड़ा उदाहरण बन गया। परिवहन समिति, जो शहर के परिवहन व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेती है, उसमें सदस्यों की नियुक्ति को लेकर दोनों पार्टियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। बीजेपी ने अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए सभी 12 सदस्यों पर अपने लोगों को नियुक्त कर दिया, जिससे शिवसेना को दरकिनार कर दिया गया।

शिवसेना ने इसे अपनी अनदेखी माना और इसका कड़ा विरोध किया। महिला नगरसेवकों का महापौर की कुर्सी के पास जाकर घेराव करना इस विरोध की तीव्रता को दर्शाता है। वहीं, बीजेपी की महिला नगरसेवकों का महापौर का बचाव करने के लिए आगे आना इस मुद्दे को और भी राजनीतिक रंग दे गया। इस हंगामे के कारण महासभा का कामकाज ठप हो गया और अंततः शिवसेना ने बहिष्कार कर दिया।

कानूनी दांव-पेंच भी इस मामले में खूब चले। 2007 के कानून और 2017 के कोर्ट के फैसले को दोनों पक्षों ने अपने-अपने तरीके से पेश किया। सागर नाईक ने 2007 के कानून का हवाला देते हुए मतदान से नियुक्ति का रास्ता दिखाया, जबकि किशोर पाटकर ने कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अनुपात के आधार पर नियुक्ति की मांग की। यह दिखाता है कि कैसे राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए कानूनों और अदालती फैसलों की व्याख्या करते हैं।

अब यह मामला नगरविकास मंत्रालय तक पहुंच गया है। शिवसेना की मांग है कि इस निर्णय पर रोक लगाई जाए। देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या शिवसेना को न्याय मिलता है या बीजेपी का फैसला बरकरार रहता है। यह घटनाक्रम नवी मुंबई की राजनीति में आने वाले समय में और भी गरमागरमी का संकेत दे रहा है।