सोशल मीडिया के बारे में सच कहने का समय

नवभारत टाइम्स

सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल से बच्चों पर पड़ रहे बुरे असर पर अमेरिका में सुनवाई हुई। फेसबुक के मार्क जकरबर्ग को अदालत में पेश होना पड़ा। वहां कंपनी के पुराने ईमेल से पता चला कि कैसे यूजर्स को ज्यादा देर तक प्लेटफॉर्म पर रोके रखने के लिए एल्गोरिदम बनाए जाते थे।

the truth about social media addiction harm and the need for regulation
सोशल मीडिया के बढ़ते दुरुपयोग और समाज, खासकर बच्चों पर इसके बुरे असर को लेकर दुनिया भर में चिंता जताई जा रही है। इसी कड़ी में, अमेरिका में फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग को एक अदालत में पेश होना पड़ा। उन पर आरोप है कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम (एक तरह का कंप्यूटर प्रोग्राम जो तय करता है कि आपको क्या दिखेगा) को इस तरह से डिजाइन करती हैं कि लोग उसके आदी हो जाएं। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ 1000 से ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं।

लॉस एंजिल्स में जिस मुकदमे में जकरबर्ग को पेश होना पड़ा, वह 20 साल की केली नाम की एक लड़की ने दायर किया है। केली का आरोप है कि वह 6 साल की उम्र से ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है। इस दौरान वह ऐसे कंटेंट (सामग्री) के संपर्क में आई, जिसने उसे नुकसान पहुंचाया और उसकी जिंदगी पर बुरा असर डाला। जिरह के दौरान, जकरबर्ग के सामने उनकी कंपनी के 10 साल पुराने ईमेल पेश किए गए। इन ईमेल में यह बात कही गई थी कि यूजर्स का 12% समय बढ़ाने के लिए एल्गोरिदम तैयार किया जाए। इस पर जकरबर्ग ने कहा कि पहले उनका लक्ष्य लोगों का समय बढ़ाना था, लेकिन अब कंपनी को इस तरह से नहीं चलाया जा रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब लोगों को कोई चीज महत्वपूर्ण लगती है, तो वे उसका ज्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं।
जकरबर्ग भले ही इन आरोपों से इनकार करें, लेकिन सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले जानते हैं कि जिस तरह का कंटेंट वे ज्यादा देखते हैं, वही बार-बार उनके सामने आता है। इसी वजह से भारत में भी अर्धनग्न और अजीबोगरीब डांस वाली रील्स की भरमार हो गई है। इस तरह के कंटेंट से समाज के नैतिक मूल्यों में आ रहे बदलाव को लेकर कई लोग चिंतित हैं। हालांकि, वे इस डर से खुलकर सवाल उठाने से कतराते हैं कि कहीं उन्हें 'दकियानूस' (पुराने ख्यालों वाला) न कह दिया जाए।

सोशल मीडिया की खोज को मानव विकास में एक बड़ी क्रांति माना गया था। साल 2010 में शुरू हुई अरब क्रांति को भी सोशल मीडिया की ही देन बताया गया था। लेकिन, अब पश्चिमी देशों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित करने और कुछ हद तक पाबंदियां लगाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। फ्रांस, डेनमार्क और नॉर्वे जैसे देशों में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर रोक है। स्पेन में यह उम्र सीमा 16 साल है। ऑस्ट्रेलिया ने भी पिछले दिसंबर में इसी तरह का कदम उठाया है।

यह कहना गलत होगा कि भारत में सब कुछ ठीक चल रहा है। यहां रील्स बनाने के चक्कर में हो रहे हादसों और जान गंवाने वाले लोगों की खबरें आए दिन आती रहती हैं। लेकिन, ऐसा नहीं लगता कि भारत में इस समस्या की गंभीरता को अमेरिका या यूरोप जैसा समझा जा रहा है। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया को रेगुलेट (नियंत्रित) किया जाए। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जिसने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकना भी उतना ही जरूरी है। अगर हम अभी कदम नहीं उठाएंगे, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। बच्चों का भविष्य और समाज के नैतिक मूल्य दांव पर लगे हैं, और इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।