City Development Learn From Lucknows Traffic Jams Stop Migration Decentralize Development
सरकार, अब दूसरे शहरों का भी विकास करो
नवभारत टाइम्स•
लखनऊ में बढ़ता ट्रैफिक जाम दूसरे शहरों के विकास की कमी का नतीजा है। लोग बेहतर सुविधाओं के लिए लखनऊ आ रहे हैं। सरकारों ने विकास को विकेंद्रीकृत नहीं किया। हर जिले में सुविधाएं न होने से लखनऊ पर बोझ बढ़ रहा है। लाखों गाड़ियां सड़कों पर हैं। जाम सड़कों से ज्यादा नीतियों पर लगा है।
लखनऊ में बढ़ता ट्रैफिक जाम सिर्फ सड़कों की समस्या नहीं है, बल्कि यह दूसरे जिलों से लखनऊ की ओर होने वाले पलायन का नतीजा है। लोग बेहतर इलाज, पढ़ाई, नौकरी और अन्य सुविधाओं के लिए लखनऊ आ रहे हैं, जिससे शहर की सड़कें जाम हो रही हैं। यह समस्या सालों से चली आ रही है क्योंकि सरकारों ने विकास को विकेंद्रीकृत करने की बजाय उसे कुछ बड़े शहरों, खासकर लखनऊ में केंद्रित कर दिया।
एहतिशाम अली का शेर है- "हम एक शहर में थे इक नदी की दूरी पर और उस नदी में कोई और वक़्त बहता था।" यह शेर लखनऊ की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ बचपन से रहने के बावजूद, अमीनाबाद जैसे इलाके होश संभालने से पहले ही चौपहिया गाड़ियों के लिए मुश्किल हो चुके थे। लेखक ने खुद देखा कि कैसे मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ाई गईं और कैसे अवैध निर्माण, विकास प्राधिकरण, नगर निगम, पुलिस और वकीलों के एक तबके की मिलीभगत से रास्ते ट्रैफिक जाम के संग्रहालय बन गए। पत्रकारपुरम, भूतनाथ, आलमबाग जैसे इलाके भी 'अमीनाबाद' बनते देखे गए।अब जब सड़कों पर आम आदमी का चलना मुश्किल हो गया है और जाम खत्म करने की कोशिशें ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं, तब यह साफ हो गया है कि यह जाम सिर्फ लखनऊ का नहीं है। असल वजह दूसरे जिलों से लखनऊ की ओर होने वाला पलायन है। लोग बेहतर इलाज के लिए लखनऊ आते हैं, अच्छी पढ़ाई के लिए लखनऊ आते हैं, नौकरी, परीक्षा, कोचिंग, दफ्तर, कोर्ट, मंत्रालय और मॉल में खरीदारी के लिए भी लखनऊ आते हैं। कुल मिलाकर, लखनऊ में लगने वाले जाम का अदृश्य इंजन यही पलायन है।
बरसों से सभी सरकारें एक ही गलती करती आ रही हैं। उन्हें विकास को विकेंद्रीकृत करने की जरूरत थी। हर जिले में बढ़िया अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, मॉल, मनोरंजन केंद्र और अच्छी आवासीय योजनाएं होनी चाहिए थीं। लेकिन इन सारी सुख-सुविधाओं को चंद बड़े शहरों जैसे लखनऊ तक सीमित कर दिया गया। इसका नतीजा अब सबके सामने है। ट्रैफिक और यातायात का हाल इन्हीं वजहों से और भी खराब हो गया है।
लखनऊ में फिलहाल 32 लाख से ज्यादा गाड़ियां हैं। इसके अलावा, करीब डेढ़ लाख गाड़ियां रोजाना बाहर से आती-जाती रहती हैं। पिछले एक साल में ही दो लाख नई गाड़ियां लखनऊ की सड़कों पर आ गईं, और पुरानी खराब गाड़ियां चलन से बाहर नहीं हुईं। सच तो यह है कि जाम सड़कों से ज्यादा नीतियों पर लगा है। जब तक यह जाम नहीं छंटता, तब तक हर नया फ्लाईओवर एक नया मजाक बनकर सामने आएगा। ऐसा हमेशा से होता आया है क्योंकि नीतियों पर हमेशा अपने-पराए के नाम पर भेदभाव होता रहा है।
गोमतीनगर रेलवे ओवर ब्रिज के नीचे लोग गलत साइड से इसलिए नहीं चलते क्योंकि उन्हें ऐसा करना पसंद है। दरअसल, मिठाईवाले चौराहे से जो एंट्री दी गई है और उसके ऊपर जो आरओबी (रेलवे ओवर ब्रिज) बना है, वह हमारी महान रोड इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना है। ऐसे ही दूसरे नमूने देखने हों तो सीतापुर रोड पर उतरने वाले ब्रिज को देखिए। ताजा उदाहरण किसान पथ आउटर रिंग रोड और नई बन रही आईआईएम रोड है। यह वाला ग्रीन कॉरिडोर जब शुरू होगा और आप उसके जाम में फंसेंगे, तब आपको यह लेख याद आएगा।
आखिर में जावेद नासिर का यह शेर बात खत्म करता है: "दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ इस बड़े शहर में तन्हाई भी मर जाती है।" यह शेर लखनऊ की भीड़भाड़ और पलायन की समस्या को एक अलग नजरिए से दिखाता है, जहाँ शहर की चकाचौंध के पीछे एक अलग तरह की तन्हाई भी छिपी है।