रास्ते में सांड मिल जाए तो पीछे हटने में ही भलाई

Contributed byजैन मुनिश्री तरुणसागर जी|नवभारत टाइम्स

जीवन में सांड जैसे टकराव से बचना चाहिए। समझदारी इसी में है कि हम पीछे हट जाएं या कोई और रास्ता निकालें। यह लेख जीवन की विभिन्न परिस्थितियों और उनसे निपटने के तरीकों पर प्रकाश डालता है। यह बताता है कि कैसे हम क्रोध जैसी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं।

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एक राजा की तरह, हमें भी जीवन में कई बार मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ता है। जब कोई राजा संकरी गली से गुजर रहा हो और अचानक सामने से एक सांड आ जाए, तो वह क्या करेगा? क्या वह सांड से कहेगा, 'हट जा, यह मेरी गली है, मैं राजा हूं'? सांड शायद कहेगा, 'तू राजा, मैं महाराजा, आ जा।' ऐसे में राजा की समझदारी इसी में है कि वह या तो चबूतरे पर चढ़ जाए या पीछे हट जाए। दिनभर में हमें ऐसे कई 'सांड' मिलते हैं, जिनसे हमें टकराना नहीं चाहिए, क्योंकि टकराव से सिर्फ बिखराव होता है। यह सीख हमें सिखाती है कि हर लड़ाई लड़ने लायक नहीं होती।

एक पिता ने अपने बेटे को गरीबी का अहसास कराने के लिए उसे गांव ले जाने का फैसला किया। वहां दो दिन गरीबों के बीच रहने के बाद पिता ने बेटे से पूछा कि उसने क्या सीखा। बेटे का जवाब चौंकाने वाला था। उसने कहा, "पिताजी! हमारे पास एक कुत्ता है और उनके पास चार कुत्ते हैं, वे हमसे कितने अमीर हैं। हम हर चीज बाजार से लाकर खाते हैं, वे खुद उगाते हैं, वे हमसे कितने अमीर हैं। हमें एसी में भी नींद नहीं आती, वे कहीं भी सो जाते हैं, वे हमसे कितने अमीर हैं।" बेटे ने गरीबी को अमीरी के पैमाने से देखा, जो कि एक अलग ही नजरिया था।
दुनिया में लोगों को चार तरह की सोच में बांटा जा सकता है। पहली सोच वाले मानते हैं कि 'मेरा तो मेरा है ही, तेरा भी मेरा है।' यह गलत सोच है। दूसरी तरह के लोग सोचते हैं कि 'मेरा, मेरा है और तेरा, तेरा है।' यह सही सोच है। तीसरी तरह के लोग मानते हैं कि 'तेरा, तेरा ही है और मेरा भी तेरा है।' यह साधु-संतों वाली सोच है। और चौथी तरह के लोग कहते हैं कि 'न मेरा है, न तेरा है, यह सब एक झमेला है।' यह बहुत ही शांत स्वभाव वाले लोगों की सोच है। हमें सोचना चाहिए कि हम इनमें से कौन सी सोच रखते हैं।

क्रोध भी कई तरह का होता है। एक 'बेहद क्रोध' होता है, जो पत्थर पर खींची गई रेखा जैसा होता है, जो मिटता नहीं। दूसरा 'बहुत क्रोध' होता है, जो ईंट पर खींची गई रेखा जैसा होता है, जो थोड़ा मुश्किल से मिटता है। तीसरी किस्म है 'मामूली क्रोध', जो रेत पर खींची गई रेखा जैसा हल्का होता है, जो आसानी से मिट जाता है। और चौथी किस्म है 'मीठा-क्रोध', जो पानी पर खींची गई रेखा जैसा होता है, जो पल भर में गायब हो जाता है। गृहस्थ जीवन में सिर्फ मामूली-क्रोध और मीठा-क्रोध ही ठीक है। बेहद-क्रोध और बहुत-क्रोध से हमेशा बचना चाहिए।

यह सीख हमें सिखाती है कि जीवन में समझदारी से काम लेना चाहिए। हमें हर छोटी बात पर गुस्सा नहीं करना चाहिए और दूसरों की भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। जैसे राजा को संकरी गली में सांड से लड़ने के बजाय रास्ता बदलना चाहिए, वैसे ही हमें भी मुश्किलों से टकराने के बजाय समझदारी से हल निकालना चाहिए। यह सीख हमें डायमंड बुक्स से मिली है।