भरोसा न डगमगाए

नवभारत टाइम्स

दिल्ली की शराब नीति मामले में आम आदमी पार्टी के नेताओं को अदालत से राहत मिली है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को मिली इस राहत से जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। यदि पर्याप्त सबूत नहीं मिले तो एजेंसियों की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। लोकतंत्र में एजेंसियों का निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है।

questions on investigation agencies is trust in the justice system eroding
दिल्ली की शराब नीति से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल और पूर्व शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को मिली राहत पर संपादकीय ‘लापरवाही की हद’ ने सवाल उठाए हैं। नोएडा के राजेश उपाध्याय ने लिखा है कि यदि अदालत को पर्याप्त सबूत नहीं मिले और मुकदमा चलाने लायक आधार भी नहीं बना, तो यह जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। किसी भी लोकतंत्र में एजेंसियों की विश्वसनीयता सर्वोपरि होती है, और यदि यह कमजोर होती है, तो न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी डगमगा जाता है। इसलिए, राजनीतिक मामलों में पारदर्शिता, संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि की गई कार्रवाई न्यायसंगत लगे और वास्तव में हो भी।

राजेश उपाध्याय ने अपने लिखे में इस बात पर जोर दिया है कि जब अदालत को किसी मामले में मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिलता, तो यह जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। उन्होंने कहा कि यदि अदालत को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले और मुकदमा शुरू करने लायक आधार भी नहीं बना, तो स्वाभाविक रूप से जांच एजेंसियों पर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी लोकतंत्र में एजेंसियों की विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण है। अगर वही कमजोर पड़े तो न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी डगमगाता है। इसलिए, यह बहुत ज़रूरी है कि राजनीतिक मामलों में पारदर्शिता, संतुलन और निष्पक्षता बनी रहे। ऐसा होने से ही की गई कार्रवाई न्यायसंगत दिखती है और वास्तव में होती भी है।