Indias Stance On Iran Neutrality Or Support For Us israel
ईरान पर भारत का ना बोलना ही अच्छा
नवभारत टाइम्स•
भारत ने ईरान के मामले में तटस्थ रुख अपनाया है। विपक्षी दल सरकार पर अमेरिकी दबाव में आने का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि, ओआईसी के मुस्लिम देशों और ईरान के पड़ोसियों ने भी ईरान का समर्थन नहीं किया। भारत के लिए इजराइल एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है।
भारत सरकार पर विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, ने अमेरिकी दबाव के आगे झुककर अपनी पारंपरिक विदेश नीति से दूरी बनाने का आरोप लगाया है। विपक्ष का मानना है कि भारत को ईरान के समर्थन में खुलकर खड़ा होना चाहिए था, और भले ही भारत खुद को तटस्थ बता रहा हो, उसका रुख अमेरिका और इस्राइल के पक्ष में झुका हुआ दिख रहा है। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने एक लेख में केंद्र सरकार के इस रुख को "जिम्मेदारी से पीछे हटना" बताया है, न कि तटस्थता। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या युद्ध में भारत की भूमिका वाकई गलत है? इस मुद्दे पर कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर करना ज़रूरी है।
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) में 56 मुस्लिम देश हैं, लेकिन इनमें से कोई भी ईरान के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने भी इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की। यहां तक कि ईरान के पड़ोसी मुस्लिम देश भी उसके समर्थन में नहीं दिखे। इसके पीछे कुछ ठोस कारण हैं। इस मुद्दे पर तीखा आंतरिक विरोध मुख्य रूप से दो देशों में देखा जा रहा है - पाकिस्तान और भारत। पाकिस्तान में तो विरोध के दौरान हिंसा हुई, लोग मारे गए और कई शहरों में इंटरनेट व सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। भारत में ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी।ईरान ने जवाबी कार्रवाई में सिर्फ इस्राइल ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब, कतर, UAE, ओमान, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन और साइप्रस जैसे देशों पर भी हमले किए। रूस की सलाह पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कुछ पड़ोसी देशों से माफी मांगी और आगे हमला न करने की बात कही, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ऐसे में, जो लोग ईरान के लिए आसमान सिर पर उठाने की बात कर रहे हैं, क्या वे चाहते हैं कि भारत अमेरिका-इस्राइल के खिलाफ मोर्चा ले? युद्ध की स्थिति में सब जायज हो जाता है।
चीन और रूस ने ईरान के हमलों का विरोध जरूर किया, लेकिन इससे ज्यादा समर्थन देने को वे भी तैयार नहीं हैं। अमेरिका ने हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत को नष्ट कर दिया। कुछ लोगों ने इसे भारत के लिए शर्मनाक बताया, पर यह समझना ज़रूरी है कि यह सही नहीं था। वह पोत श्रीलंका की समुद्री सीमाओं से भी बाहर चला गया था। युद्ध की स्थिति में ईरान के पोत और विमान जहां भी होंगे, निशाना बनेंगे। ईरान भी अपनी शक्ति के अनुसार यही कर रहा है। उसका एक पोत और क्रू कोच्चि बंदरगाह पर सुरक्षित हैं।
आज जो लोग ईरान के लिए आवाज उठा रहे हैं, उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को उत्सव मना रहे इस्राइलियों पर हमास के बर्बर हमले के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला था। ये कैसे सिद्धांत हैं? क्या तब यह नहीं सोचा गया कि इससे भारत-इस्राइल के रिश्तों पर असर पड़ेगा और यह देश के हित के खिलाफ होगा?
विदेश और रक्षा नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर तय होती है। इस पर समय और परिस्थितियों का गहरा असर पड़ता है। मान लीजिए कि ईरान के साथ हमारे संबंध बहुत अच्छे थे, लेकिन क्या इस्राइल के साथ हमारे संबंध खराब हैं? लगभग हर मुश्किल घड़ी में इस्राइल ने भारत का साथ दिया है। 1962 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर इस्राइल ने बिना मार्क वाले हथियारों की खेप भेजी थी। आज इस्राइल के साथ हमारा सामरिक सहयोग उस सीमा तक पहुंच चुका है, जहां दोनों देश एक-दूसरे के रक्षा लॉजिस्टिक्स का भी उपयोग कर सकते हैं।
ईरान पहले भी पूरे क्षेत्र में मिसाइलें दागता रहा है। हिजबुल्लाह, हूती और हमास जैसे आतंकवादी संगठनों को पालने वाला देश शांतिवादी नहीं हो सकता। बलूचिस्तान के एक हिस्से पर उसका कब्जा है और वहां के मुक्ति आंदोलन को वह पाकिस्तान की तरह ही दबाता रहा है। इस्लामी क्रांति के बाद उसका पहला युद्ध इराक से हुआ। उसके मुताबिक इस्राइल को धरती पर रहने का अधिकार नहीं है और वह पड़ोसी देशों को सैन्य ताकत से डराता रहता है। ऐसे ईरानी शासन का साथ देने का कोई तुक नहीं बनता।
भारत के सभी अरब देशों के साथ अच्छे संबंध हैं। अगर हम ईरान के साथ खुलकर खड़े होते हैं, तो सऊदी अरब, UAE, बहरीन, ओमान और कुवैत जैसे देशों को सही संदेश नहीं जाएगा। सही तो यही होगा कि ईरान आतंकवादी समूहों को समर्थन देना बंद करे, इस्राइल के अस्तित्व को स्वीकारे और परमाणु हथियार बनाने की सोच छोड़ दे। भारत कभी भी युद्ध का पक्षधर नहीं हो सकता, पर जिन घटनाओं पर हमारा नियंत्रण नहीं है, उनमें हम कुछ नहीं कर सकते।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत की विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों पर आधारित रही है। ईरान के साथ हमारे ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हमें अपनी सुरक्षा और सामरिक हितों को भी देखना होगा। ईरान द्वारा आतंकवादी संगठनों को समर्थन देना और क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करना भारत के लिए चिंता का विषय है। वहीं, इस्राइल ने कई मौकों पर भारत का साथ दिया है, खासकर 1962 के युद्ध के दौरान। आज दोनों देशों के बीच रक्षा और सामरिक सहयोग काफी मजबूत है।
विपक्ष का यह तर्क कि भारत को ईरान के समर्थन में खड़ा होना चाहिए था, कई सवालों को जन्म देता है। क्या यह भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होगा? क्या इससे हमारे अन्य महत्वपूर्ण सहयोगियों के साथ संबंध खराब नहीं होंगे? ओआईसी जैसे मुस्लिम देशों के समूह की चुप्पी भी इस बात का संकेत देती है कि ईरान की नीतियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं हैं।
ईरान द्वारा इस्राइल और अन्य खाड़ी देशों पर किए गए हमले ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में भारत का तटस्थ रुख अपनाना, जिसे कुछ लोग जिम्मेदारी से पीछे हटना कह रहे हैं, शायद वर्तमान परिस्थितियों में सबसे व्यावहारिक कदम है। भारत का लक्ष्य हमेशा शांति और स्थिरता बनाए रखना रहा है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि ईरान के परमाणु हथियार बनाने की महत्वाकांक्षाएं भी एक बड़ा मुद्दा हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में, भारत का रुख ईरान को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
अंततः, भारत की विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों, वैश्विक शांति और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए तय किया जाएगा। ईरान के मामले में, भारत का वर्तमान रुख इसी संतुलन को साधने का प्रयास है।