जामा मस्जिद ने संभाली है शिया परंपरा

नवभारत टाइम्स

कश्मीरी गेट की शिया जामा मस्जिदें आज भी इतिहास और शिया परंपराओं को सहेजे हुए हैं। 1841-42 में बनी यह मस्जिद अपने इतिहास और संस्कृति के लिए जानी जाती है। रमजान में यहां शांतिपूर्ण इबादत होती है। यह मस्जिद शिया समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बनी हुई है।

jama masjid a living center of delhis shia tradition and history
कश्मीरी गेट की ऐतिहासिक गलियों में आज भी इतिहास की गूंज सुनाई देती है, जहाँ 1841-42 में नवाब हामिद अली खान द्वारा बनवाई गई शिया जामा मस्जिद अपनी भव्यता से ज़्यादा अपने इतिहास और संस्कृति के लिए जानी जाती है। यह इंडो-पर्शियन शैली में बनी मस्जिद, जिसमें तीन गुंबद और दो मीनारें हैं, रमजान के महीने में भी शांति का एक अनूठा केंद्र बनी रहती है, जहाँ लोग इबादत में लीन रहते हैं और भाईचारे का संदेश बाँटते हैं। बंटवारे के बाद शिया समुदाय के कम होने के बावजूद, यह मस्जिद आज भी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, और कृष्णा गली की खजूर वाली मस्जिद जैसी अन्य शिया मस्जिदें भी इस समुदाय की विरासत को सँजोए हुए हैं।

कश्मीरी गेट की भीड़भाड़ वाली गलियों में इतिहास आज भी महसूस होता है। बुलंद जामा मस्जिद के पास ही शिया जामा मस्जिद है। यह मस्जिद 1841–42 में नवाब हामिद अली खान ने बनवाई थी, जो मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के प्रधानमंत्री थे। यह मस्जिद अपने बड़े आकार के लिए नहीं, बल्कि अपने इतिहास और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इसमें तीन गुंबद और दो मीनारें हैं। इसका निर्माण इंडो-पर्शियन शैली में हुआ है, जिसमें मेहराबदार दरवाजे, नक्काशीदार खंभे और फूलों की सुंदर सजावट है। मस्जिद का मुख्य प्रवेश मोरी गेट की ओर से है।
रमजान के महीने में जहाँ एक ओर जामा मस्जिद और आसपास के बाज़ारों में खूब रौनक और भीड़ होती है, वहीं शिया जामा मस्जिद में एक अलग ही शांति का माहौल रहता है। यहाँ लोग इबादत में डूबे रहते हैं और खामोशी से अपनी प्रार्थनाएँ करते हैं। रमजान का महीना रोजा रखने, तरावीह की नमाज पढ़ने और इबादत करने के लिए बहुत खास होता है। इफ्तार के समय, सभी रोजेदार एक साथ बैठकर खाना खाते हैं, बातें करते हैं और अपनी खुशियाँ बाँटते हैं। यह महीना हमें अनुशासन, धैर्य और भाईचारे का महत्वपूर्ण संदेश देता है।

शिया जामा मस्जिद में अजान के समय लाउडस्पीकर की आवाज़ काफी धीमी रखी जाती है। इसका एक खास कारण है कि अब इस इलाके में शिया समुदाय के लोग बहुत कम रह गए हैं, और जो हैं, वे खुद ही नमाज़ के लिए आ जाते हैं। जुमे की नमाज़ में लगभग 600 से 700 लोग बारा हिंदू राव, शास्त्री पार्क और नोएडा जैसे दूर-दराज के इलाकों से भी आते हैं। 1947 से पहले, यहाँ शिया समुदाय काफी बड़ा और समृद्ध था। लेकिन देश के बंटवारे के बाद, कई परिवार पाकिस्तान चले गए और बाकी दिल्ली-एनसीआर के दूसरे इलाकों में बस गए। इसके बावजूद, यह मस्जिद आज भी शिया समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है।

कश्मीरी गेट इलाके में हैमिल्टन रोड, कृष्णा गली, चाबी गंज और पंजा शरीफ में भी कई शिया मस्जिदें मौजूद हैं। इनमें से कृष्णा गली की खजूर वाली मस्जिद भी काफी मशहूर है। इसी गली में मौलवी मोहम्मद बाकर रहते थे, जो 'दिल्ली उर्दू अखबार' के संपादक थे। यह उत्तर भारत के शुरुआती उर्दू अखबारों में से एक था। 1857 की क्रांति के दौरान, उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। अंग्रेजों ने 16 सितंबर 1857 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 18 सितंबर को गोली मारकर शहीद कर दिया।

रमजान के महीने में कश्मीरी गेट की शिया मस्जिदों में खजूर बाँटा जाता है और हजरत अली की याद में मातम भी मनाया जाता है। मस्जिदों में दरी बिछाकर लोगों को सेवइयां, खीर, शीर खुरमा, फल आदि बाँटा जाता है। रमजान का महीना यहाँ सिर्फ इबादत का समय नहीं है, बल्कि यह मिलने-जुलने और भाईचारे को बढ़ाने का भी एक अहम मौका है। कश्मीरी गेट की ये मस्जिदें और गलियाँ आज भी इतिहास और शिया समुदाय की पुरानी परंपराओं को बड़ी हिफाज़त से सँजोए हुए हैं।