Air Strike On Iran Black Clouds A Threat For India Too Serious Impact On Climate
तेहरान के काले बादल सभी के लिए ख़तरा
नवभारत टाइम्स•
ईरान के तेल ठिकानों पर हुए हमलों से तेहरान में जहरीले काले बादल छा गए हैं। इन बादलों से एसिड रेन का खतरा है, जो ईरान के साथ-साथ भारत जैसे पड़ोसी देशों को भी प्रभावित कर सकता है। यह प्रदूषण जलवायु परिवर्तन को और बढ़ाएगा। विशेषज्ञ तत्काल और दीर्घकालिक प्रभावों की चेतावनी दे रहे हैं।
ईरान के तेल ठिकानों पर अमेरिका-इस्राइल की एयर स्ट्राइक के बाद राजधानी तेहरान और आसपास के इलाकों में जहरीले काले बादलों का डेरा जम गया है, जिससे लोगों का सांस लेना दूभर हो गया है। ईरान की रेड क्रीसेंट सोसायटी ने लोगों को एसिड रेन से बचने की चेतावनी दी है। इन जहरीले बादलों और एसिड रेन का ईरान के साथ-साथ भारत और दुनिया पर क्या असर पड़ेगा, इस पर प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक और पर्यावरण नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर अंजल प्रकाश ने विस्तार से बताया है। प्रोफेसर अंजल भारतीय स्कूल ऑफ बिजनेस में क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफेसर (रिसर्च) और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर हैं, और IPCC की कई महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स में लीड ऑथर रह चुके हैं।
प्रोफेसर अंजल प्रकाश के अनुसार, ईरान से उठने वाले तेल युक्त काले बादल पाकिस्तान के पश्चिमी क्षेत्र (बलूचिस्तान) तक उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ फैल रहे हैं। पाकिस्तान का मौसम विभाग पहले ही इन बादलों और जहरीले धुएं को लेकर चेतावनी जारी कर चुका है। भारत के लिए फिलहाल सीधा खतरा कम है, क्योंकि हिमालय और ईरान के बीच की दूरी एक सुरक्षा कवच का काम कर रही है। हालांकि, अगर जेट स्ट्रीम (ऊपरी वायुमंडल में चलने वाली तेज हवाएं) मजबूत होती हैं, तो इन काले गुबार के महीन कण गुजरात, राजस्थान या पंजाब तक पहुंच सकते हैं। अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे पड़ोसी देश पहले ही प्रभावित होंगे। HYSPLIT जैसे वैश्विक मॉडल बताते हैं कि तेल जलने से निकलने वाले कण पांच से 10 दिनों में 2000 से 3000 किलोमीटर दूर तक फैल सकते हैं।इन जहरीले बादलों से होने वाली एसिड रेन का तत्काल असर एक से दो हफ्ते तक रह सकता है, लेकिन इसका दीर्घकालिक प्रभाव कई सालों तक महसूस किया जाएगा। मिट्टी में जमा होने वाली अम्लता (एसिडिटी) 10 से 20 साल तक बनी रह सकती है। यह मिट्टी की प्राकृतिक संतुलन क्षमता को खत्म कर देगी। इंसानों में, इसकी वजह से सांस संबंधी बीमारियां 20 से 30% तक बढ़ सकती हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह एक बड़ा खतरा है। खेतों में फसल की उपज 10-15% तक कम हो सकती है, जिससे आने वाले समय में खाद्य संकट भी पैदा हो सकता है।
एसिड रेन पर्यावरण के लिए बेहद घातक है, खासकर तेहरान जैसे घनी आबादी वाले शहरों के लिए जहां पहले से ही वायु प्रदूषण का स्तर ऊंचा है। यह पेड़-पौधों की जड़ों को कमजोर करती है, पत्तियों को झुलसा देती है और वनों की जैव विविधता को नष्ट कर देती है। इंसानों में न्यूरोलॉजिकल विकार भी संभव हैं। तेहरान जैसे शहर में, यह स्थिति महामारी का रूप ले सकती है। प्रोफेसर प्रकाश ने अतीत के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि वियतनाम में एजेंट ऑरेंज और यूक्रेन युद्ध के प्रदूषण ने भी ऐसे ही जोखिम पैदा किए थे। ये केमिकल युक्त बादल भारी धातुओं जैसे लेड और मरकरी को मिट्टी और पानी में जमा करेंगे। ये धातुएं फूड चेन (खाद्य श्रृंखला) में शामिल हो जाएंगी और फिर खाने के जरिए हमारे शरीर में पहुंचकर DNA को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को प्रोफेसर प्रकाश युद्ध प्रदूषण के बढ़ते खतरे के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि दुनिया में बढ़ रहे युद्ध, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के खिलाफ चल रही लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण में देशों की इच्छाशक्ति से सकारात्मक परिणाम दिखे हैं, जैसे पेरिस समझौते से उत्सर्जन में कमी आई है। लेकिन युद्धों की वजह से पर्यावरण संरक्षण पर विपरीत असर पड़ा है। यूक्रेन में बमबारी से 35 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के बराबर प्रदूषण हुआ। अब ईरान में तेल जलने से हर दिन लाखों टन ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में समा रही है। यह निश्चित रूप से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहा है।
बीते एक साल में दुनिया ने 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पार कर लिया है। प्रोफेसर प्रकाश के अनुसार, इन युद्धों की वजह से गर्मी और बढ़ सकती है। यह युद्ध उत्सर्जन को बढ़ाकर ग्लोबल वॉर्मिंग को 2.3 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक ले जा सकता है। ईरान जैसे तेल उत्पादक देश में युद्ध से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा होगा, जिससे कोयले पर निर्भरता बढ़ेगी। इसकी वजह से भी गर्मी भयानक स्तर पर जा सकती है।
बचाव और राहत के उपायों के बारे में प्रोफेसर प्रकाश ने सुझाव दिया कि ईरान को तुरंत वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन स्थापित करने चाहिए। प्रभावित मिट्टी को चूने से न्यूट्रलाइज (निष्क्रिय) करना चाहिए और स्वास्थ्य शिविर लगाने चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, UNEP-WHO की संयुक्त सहायता टीम भेजी जानी चाहिए। वैश्विक संधियों में युद्धकालीन पर्यावरण संरक्षण खंड जोड़े जाने की जरूरत है। भारत को पाकिस्तान सीमा पर निगरानी मजबूत करनी चाहिए और मॉनसून से पहले चेतावनी जारी करनी चाहिए। विकासशील देशों के लिए एक जलवायु शांति कोष बनाया जाना चाहिए, जो युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में हरित पुनर्वास के लिए फंड करे। अंतरराष्ट्रीय अदालतों में पर्यावरण अपराधों के मुकदमे चलाए जाने चाहिए।
प्रोफेसर अंजल प्रकाश ने बताया कि तेल जलने से निकलने वाले काले धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जैसी गैसें होती हैं। जब ये गैसें हवा में मौजूद पानी के साथ मिलती हैं, तो सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनता है। यही एसिड जब बारिश के रूप में गिरता है, तो उसे एसिड रेन कहते हैं। यह बारिश न सिर्फ इंसानों और जानवरों के लिए हानिकारक है, बल्कि इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों को भी नुकसान पहुंचाती है। मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, जिससे खेती पर बुरा असर पड़ता है। पानी के स्रोत भी प्रदूषित हो जाते हैं, जो जलीय जीवन के लिए खतरा बन जाते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "जेट स्ट्रीम" ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली तेज हवाओं की एक धारा है, जो मौसम को प्रभावित करती है। अगर यह धारा मजबूत होती है, तो यह ईरान से निकले प्रदूषित कणों को भारत तक ले जा सकती है। हालांकि, भारत की भौगोलिक स्थिति और हिमालय की मौजूदगी एक हद तक सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन पूरी तरह से निश्चिंत नहीं रहा जा सकता।
प्रोफेसर प्रकाश ने इस बात पर जोर दिया कि युद्धों का पर्यावरण पर सीधा और विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। यह न केवल तत्काल प्रदूषण फैलाता है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ावा देता है। जब देश युद्ध में उलझे होते हैं, तो वे पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। इसके बजाय, वे अक्सर जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता बढ़ाते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और बढ़ जाता है। यह एक दुष्चक्र है जो ग्लोबल वॉर्मिंग को और तेज करता है।
उन्होंने कहा कि पेरिस समझौता एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन युद्धों की वजह से इसके लक्ष्यों को प्राप्त करना और भी मुश्किल हो गया है। देशों को युद्धों के पर्यावरणीय प्रभावों को गंभीरता से लेना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे तंत्र विकसित करने चाहिए जो युद्धों के दौरान पर्यावरण की रक्षा कर सकें। यह केवल एक देश की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है।