रूट बदलना होगा

नवभारत टाइम्स

देश को आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करनी होगी। एलपीजी की सप्लाई में दिक्कतें इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर इशारा करती हैं। पुरानी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदलने और नई खरीद में इलेक्ट्रिक को प्राथमिकता देने से यह संभव है। बिजली उत्पादन और वितरण को बेहतर बनाना भी जरूरी है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।

move towards electric vehicles india needs to reduce dependence on fuel imports
सोचिए, अगर एक सुबह पूरा देश अचानक इलेक्ट्रिक गाड़ियों की खरीदारी के लिए शोरूम की तरफ दौड़ पड़े तो क्या होगा? एलपीजी सप्लाई में दिक्कतें आने के बाद इंडक्शन स्टोव की अचानक बढ़ी मांग को देखकर यह सवाल बहुत अहम हो जाता है। इंडक्शन स्टोव कोई नई चीज नहीं है, यह सालों से बाजार में था और इसमें खूबियां भी थीं, फिर भी ज्यादातर घरों में यह गैस चूल्हे का विकल्प नहीं बन पाया। जिन घरों में गैस और इंडक्शन दोनों थे, वहां भी इंडक्शन को पहली प्राथमिकता नहीं मिली। अगर ऐसा होता तो एलपीजी का इस्तेमाल उन जगहों के लिए बचाया जा सकता था जहाँ उसके बिना काम चलाना मुश्किल है।

जब एलपीजी का बड़ा हिस्सा हमें बाहर से मंगवाना पड़ता है, तो उसका इस्तेमाल समझदारी से करना चाहिए। अक्सर हम तब तक नहीं बदलते जब तक हालात हमें मजबूर न कर दें। इनकम टैक्स रिटर्न भरने की आखिरी तारीख इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। आखिरी दिन इतनी भीड़ हो जाती है कि वेबसाइट तक ठप पड़ जाती है। लोग इनकम टैक्स भरते समय जितनी चिंता करते हैं, उतनी पेट्रोल-डीजल खरीदते समय नहीं करते। हकीकत यह है कि पेट्रोल पंप पर हमारी जेब से निकलने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में चला जाता है।
जैसे ही इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बात आती है, हम समस्याओं की एक लंबी लिस्ट सामने रख देते हैं। सवाल पूछना गलत नहीं है, लेकिन क्या हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब बाहर से आने वाला पेट्रोल और डीजल अचानक मिलना बंद हो जाए या बहुत महंगा हो जाए? इस स्थिति को बदलने के तरीके मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, पुरानी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदलने को बढ़ावा दिया जा सकता है। जो भी नई गाड़ी खरीदें, उसमें इलेक्ट्रिक को प्राथमिकता दें। आज हम कह सकते हैं कि इसकी क्या जरूरत है, कई तर्क दे सकते हैं, टाल सकते हैं क्योंकि अभी किसी ने हमें मजबूर नहीं किया है। लेकिन तेजी से बदलते दुनिया के हालात में उन चीजों पर आंखें मूंद लेना समझदारी नहीं है, जिनके लिए हम दूसरों पर निर्भर हैं।

यह निर्भरता सिर्फ ईंधन तक ही सीमित नहीं है। खाने के तेल का आयात और सोने में हमारा पारंपरिक लगाव भी हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ डालता है। सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। बिजली से चलने वाले उपकरणों की क्षमता और तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए गंभीर कोशिशें जरूरी हैं। अगर देश में बिजली का उत्पादन काफी है, तो यह भी पक्का करना जरूरी है कि वह हर घर तक सही दाम पर पहुंचे।

एलपीजी की सप्लाई में आई दिक्कतों ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम अपनी जरूरतों के लिए कितना दूसरों पर निर्भर हैं। इंडक्शन स्टोव जैसी चीजें सालों से मौजूद थीं, लेकिन हमने उन्हें तब तक नहीं अपनाया जब तक मजबूरी नहीं आई। यह दिखाता है कि हम बदलाव के लिए तभी तैयार होते हैं जब हालात हमें धक्का देते हैं।

पेट्रोल और डीजल पर हमारी निर्भरता भी एक बड़ी चिंता का विषय है। हम इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, लेकिन पेट्रोल पंप पर हम जो पैसा खर्च करते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार के पास जाता है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बात आने पर हम कई सवाल उठाते हैं, जैसे चार्जिंग स्टेशन की कमी या गाड़ी की कीमत। लेकिन हमें यह सोचना चाहिए कि अगर कभी पेट्रोल-डीजल मिलना मुश्किल हो गया तो क्या होगा?

पुरानी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदलना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे पुरानी गाड़ियों का इस्तेमाल भी जारी रहेगा और हम पर्यावरण के लिए भी कुछ अच्छा कर पाएंगे। नई गाड़ियों की खरीद में इलेक्ट्रिक को प्राथमिकता देना भविष्य के लिए एक समझदारी भरा कदम होगा।

यह सिर्फ ईंधन की बात नहीं है। खाने के तेल का आयात और सोने में निवेश भी हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता है। हमें इन क्षेत्रों में भी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार को बिजली उत्पादन बढ़ाने और उसे हर घर तक पहुंचाने के लिए काम करना चाहिए। बिजली से चलने वाले उपकरणों की तकनीक को बेहतर बनाने और उन्हें सस्ता बनाने के लिए भी प्रयास होने चाहिए।

दुनिया के हालात तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में हमें उन चीजों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। हमें अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे रास्ते खोजने होंगे जो टिकाऊ और सुरक्षित हों। इलेक्ट्रिक गाड़ियां और इंडक्शन स्टोव जैसे विकल्प हमें इस दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं। यह समय है कि हम सिर्फ बातें न करें, बल्कि इन बदलावों को अपनाएं।