जिन्होंने परंपराओं को जीवित रखा, उन तक पहुंचे रोशनी

नवभारतटाइम्स.कॉम•
diwali a festival to keep traditions alive and adopt the ideals of maryada purushottam shriram
भारतीय संस्कृति में दिवाली अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और अधर्म से धर्म की ओर बढ़ने का सांस्कृतिक संकल्प है। भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ा यह पर्व हमें रामायण के उन आदर्शों का स्मरण कराता है, जो सदियों से भारतीय समाज को जीवन की दिशा देते आए हैं। अयोध्यावासियों ने श्रीराम के स्वागत में दीप जलाए थे। उनका प्रकाश केवल राजमहल और गलियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह न्याय, मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और लोककल्याण की भावना का भी प्रतीक था। ये प्रसंग धार्मिक आख्यान नहीं, ऐसे जीवन-मूल्य हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी है।

लोक कल्याण की हो भावना
आज जब समाज हिंसा, अविश्वास, मानसिक तनाव, अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और कमजोर होते सामाजिक संबंधों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब इन मूल्यों का महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसे में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा ही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान, अविवेक से विवेक और व्यक्तिगत सफलता की आकांक्षा से सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना की ओर ले जाती है। दीपावली मनाते हुए हमें यह विचार करना चाहिए कि घरों में दीप जलाने के साथ-साथ क्या हम अपने विचारों, व्यवहार, शिक्षा और सामाजिक जीवन में भी इन आदर्शों का प्रकाश फैला पा रहे हैं?

श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि उत्सव की सार्थकता तभी है, जब उसमें प्रसन्नता और लोक कल्याण सम्मिलित हो। इसी भावना के साथ दीपावली को समाज के प्रत्येक वर्ग तक खुशियां पहुंचाने का अवसर बनाना चाहिए। बाजार में उपलब्ध विदेशी सजावटी सामान और कृत्रिम रोशनी के स्थान पर स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीपक, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों को प्राथमिकता देना हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था- दोनों के लिए हितकारी है। जब हम स्थानीय उत्पादों को अपनाते हैं, तब त्योहार की खुशियां उन तक भी पहुंचती हैं, जिनके श्रम से हमारी परंपराएं जीवित हैं।

अपनी मूल भावना और स्वरूप से भिन्न रूप में आज प्रकाश का पर्व प्रदूषण व अस्वस्थता का कारण भी बनता जा रहा है। अत्यधिक आतिशबाजी से निकलने वाला धुआं और रासायनिक पदार्थ वायु को प्रदूषित करते हैं। जिस पर्व का मूल संदेश जीवन में प्रकाश फैलाना है, उसे दूसरों के स्वास्थ्य और प्रकृति के लिए संकट का कारण बनाना उचित नहीं। इसलिए पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी दीपावली के उत्सव का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए।

इस दिशा में विज्ञान और तकनीक का उपयोग भी किया जाना चाहिए। भारत के वैज्ञानिकों, तकनीकी संस्थानों और युवा नवप्रवर्तकों को स्वदेशी विकल्प विकसित करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए, जिनसे आतिशबाजी जैसा प्रकाश और उत्सवी अनुभव मिले लेकिन धुआं व रासायनिक गैसों का उत्सर्जन न हो। इन विकल्पों की लागत कम होगी। परंपरा और आधुनिक विज्ञान का ऐसा समन्वय ही आत्मनिर्भर भारत की भावना को मजबूत कर सकता है।

आचरण में मिठास जरूरी

दीपावली की मिठास भी हमारी सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। त्योहारों के समय अधिक मुनाफा कमाने के लिए खाद्य पदार्थों में मिलावट करना गंभीर चिंता का विषय है। रामायण में रावण का अहंकार, छल और अधर्म उसके पतन का कारण बना। आज के संदर्भ में मिलावट, धोखाधड़ी, शोषण और लालच भी ऐसी ही आसुरी प्रवृत्तियां हैं। श्रीराम के आदर्शों का अनुसरण करने का अर्थ है कि हम अपने व्यवसाय और व्यवहार में भी ईमानदारी रखें। त्योहारों की वास्तविक मिठास हमारे आचरण में होनी चाहिए। परिवार और विद्यालय इस सीख को व्यवहार में उतारने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। बच्चों को मिट्टी के दीपक खरीदने, उन्हें सजाने, स्थानीय कारीगरों के श्रम का सम्मान करने और जरूरतमंदों के साथ खुशियां साझा करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। यही वह प्रक्रिया है, जिससे ज्ञान के साथ संवेदना और व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास होता है।

आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आधुनिक तकनीक और आर्थिक प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों से युक्त नागरिक भी आवश्यक हैं। हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी है, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करे, स्वदेशी क्षमताओं पर विश्वास रखे और विज्ञान व तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए करे। इस पर्व पर संकल्प लेना चाहिए कि हम श्रीराम के आदर्शों को केवल स्मरण नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें अपने आचरण में भी उतारेंगे। यही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा और एक संवेदनशील, समरस व विकसित भारत के निर्माण में हमारा सार्थक योगदान होगा।

(NCERT, नई दिल्ली के निदेशक)

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