क्या आपने कभी पौ फटने के समय किसी चिड़िया की चहचहाहट, जंगल में पत्तों की सरसराहट या रात के सन्नाटे में झींगुरों की आवाज सुनी है? किसी पहाड़ी नदी के बहते पानी की कलकल सुनी है क्या? प्रकृति की ये आवाजें तभी सुनाई देती हैं, जब हम खुद को शांत करके उन्हें सुनने का प्रयास करते हैं। लेकिन, खामोशी का अर्थ केवल बाहरी शोर का न होना नहीं है। असली खामोशी तो हमारे भीतर होती है। यह वह अवस्था है, जब सामने वाला कुछ कहे बिना भी अपनी बात हम तक पहुंचा देता है और हम उसे सुन लेते हैं।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम जिस कोलाहल में जी रहे हैं, उसमें अपने भीतर की आवाज सुनना भी मुश्किल हो गया है। अक्सर मन करता है कि कुछ दिन पहाड़ों पर किसी कॉटेज में बिताएं। सामने नदी हो, आसपास पक्षियों की आवाजें और जिंदगी की भागदौड़ से दूर सुकून के कुछ पल। लेकिन, वहां जाकर भी मन की बेचैनी दूर नहीं होती। बाहर की शांति तभी भीतर उतरती है, जब हम अपनी इच्छाओं और पाने की लालसा से थोड़ा मुक्त हो पाते हैं।खामोशी को महसूस करने के लिए अंतर्मन का शांत होना जरूरी है। हमारे आसपास के लोग ही नहीं, बल्कि टीवी, सोशल मीडिया और मोबाइल पर लगातार मिलने वाली सूचनाएं भी हमारे मन को प्रभावित करती हैं। कुछ पल का मनोरंजन देने वाली ये चीजें कब हमारे एकांत पर कब्जा कर लेती हैं, पता नहीं चलता। इस लगातार शोर का असर हमारी संवेदनशीलता पर भी पड़ता है। हम अपने विचारों में इतने उलझ जाते हैं कि प्रकृति की सुंदरता और अपनों के दुख तक को महसूस नहीं कर पाते।
इसलिए रोज कुछ समय अपने लिए हो- न मोबाइल, न कोई काम। बस शांत बैठकर अपने विचारों को आते-जाते देखना है और अपने मन को समझने की कोशिश करनी है। जब हम अपने भीतर की आवाज सुनना सीखते हैं, तभी दूसरों की अनकही पीड़ा भी सुन पाते हैं। खामोशी हमें दुनिया से दूर नहीं करती, उससे अधिक गहराई से जोड़ती है।