भरोसे की परीक्षा

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test of trust how amir khusrau became the successor of hazrat nizamuddin auliya
हजरत निजामुद्दीन औलिया के 22 शिष्य थे। अमीर खुसरो भी शामिल थे इनमें। हर शिष्य की इच्छा गुरु की गद्दी पर बैठने की थी। एक दिन हजरत शिष्यों को लेकर एक संकरी, गंदी और उपेक्षित बस्ती में पहुंचे। शिष्यों को नीचे रुकने का निर्देश देकर वह स्वयं एक मकान में चले गए। वहां रहने वाली एक वेश्या ने उनका स्वागत किया। हजरत ने उससे एकांत स्थान, साधारण भोजन और ढके हुए शरबत की व्यवस्था करने को कहा। जब सेवक सामान लेकर ऊपर जाने लगा, तो नीचे खड़े शिष्यों के मन में संदेह पैदा हो गया। शिष्य आपस में कहने लगे कि आज तो पीर की पीरी ही चली गई, अब शराब-कबाब का दौर चलेगा। एक-एक करके सभी शिष्य चले गए। केवल अमीर खुसरो वहीं खड़े रहे। कुछ देर बाद हजरत नीचे आए। उन्होंने केवल खुसरो को देखा और पूछा, ‘तुम नहीं गए?’ खुसरो ने उत्तर दिया, ‘हजरत, आपकी उपस्थिति ही मेरा ठिकाना है। आपके बिना मेरे लिए जाने की कोई जगह नहीं।’ हजरत ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह घटना बताती है कि सच्ची निष्ठा की परीक्षा अनुकूल परिस्थितियों में नहीं, संदेह से भरी घड़ी में होती है।

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