भारत की 'महासागर' सोच: जापान के 'एफओआईपी' से मेल खाती है हिंद-प्रशांत में नई समुद्री साझेदारी

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 1 जुलाई (आईएएनएस)। भारत की समुद्री सुरक्षा की सोच अब 'सागर' से आगे बढ़कर 'महासागर' तक पहुँच गई है, जो जापान की 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' (एफओआईपी) नीति के साथ मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत लोकतांत्रिक साझेदारी का निर्माण कर रही है। यह नया दृष्टिकोण, जो सुरक्षा के साथ-साथ विकास, व्यापार और पर्यावरण की स्थिरता पर भी जोर देता है, ग्लोबल साउथ के देशों को आत्मनिर्भर बनने और अपनी राह खुद चुनने में मदद करेगा। भारत की यह पहल, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई थी, न केवल समुद्री सुरक्षा को मजबूत करती है, बल्कि चीन की बढ़ती क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के मुकाबले एक वैकल्पिक, समावेशी और लोकतांत्रिक ढांचा भी पेश करती है।

भारत की समुद्री सोच में एक बड़ा बदलाव आया है। पहले यह सोच 'क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास' (सागर) तक सीमित थी, लेकिन अब यह 'क्षेत्रों के पार सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र प्रगति' (महासागर) तक पहुँच गई है। यह नया विचार जापान की 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' (एफओआईपी) नीति से काफी मिलता-जुलता है। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने खुद अपने एक लेख में इस बात का जिक्र किया है। दोनों देशों के नेताओं की यह पहल हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक ऐसी लोकतांत्रिक साझेदारी को दर्शाती है, जहाँ सुरक्षा के साथ-साथ विकास को भी महत्व दिया जाता है। इसमें सभी को साथ लेकर चलने की भावना है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए मजबूत क्षमताएं विकसित की जा रही हैं। आज की दुनिया में अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे में भारत और जापान को विश्वास है कि उनकी यह मिलती-जुलती सोच सिर्फ समुद्री सुरक्षा को ही मजबूत नहीं करेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों को भी अपनी राह खुद चुनने और आगे बढ़ने में मदद करेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार मार्च 2015 में हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) के लिए भारत की नीति के तहत 'सागर' की सोच पेश की थी। यह तब हुआ था जब वे मॉरीशस गए थे और वहां कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स द्वारा बनाए गए ऑफशोर पेट्रोल पोत बराकुडा को शामिल किया गया था। 'सागर' का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि बनाए रखना था। प्रधानमंत्री मोदी ने 'सागर' को भारत की एक बड़ी जिम्मेदारी के रूप में बताया था। उन्होंने कहा था कि भारत 'सुरक्षा देने वाले भरोसेमंद साथी' की भूमिका निभाएगा। इसका मतलब था कि भारत समुद्री मामलों में विश्वास, पारदर्शिता और विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने को बढ़ावा देगा।

'सागर' की सोच को आगे बढ़ाते हुए, मार्च 2025 में जब प्रधानमंत्री मोदी फिर से मॉरीशस गए, तो उन्होंने 'महासागर' की शुरुआत की। यह 'सागर' का ही एक विस्तार है। 'महासागर' की सोच के साथ, भारत सिर्फ हिंद महासागर तक ही सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक नेतृत्वकारी भूमिका निभाना चाहता है। 'महासागर' ऐसी सोच को बढ़ावा देता है जिसमें सुरक्षा के साथ-साथ विकास, व्यापार और पर्यावरण की स्थिरता को भी बहुत महत्व दिया गया है।

यह एक दिलचस्प बात है कि भारत की कई भाषाओं में 'सागर' का मतलब समुद्र होता है, जबकि 'महासागर' का अर्थ बड़ा समुद्र होता है। इस नाम का इस्तेमाल यह दिखाता है कि भारत की सोच अब सिर्फ हिंद महासागर क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। यह एक व्यापक वैश्विक समुद्री दृष्टिकोण की ओर बढ़ रही है। इसमें खास तौर पर ग्लोबल साउथ के देशों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। भारत की थाईलैंड में पूर्व राजदूत सुचित्रा दुरई ने भी पहले इस बात का जिक्र किया था। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी की मॉरीशस, मालदीव, त्रिनिदाद और टोबैगो, घाना और फिलीपींस जैसे देशों के साथ बातचीत और यात्राएं 'महासागर' की सोच से ही जुड़ी हुई हैं।

वहीं, जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने एक लेख में अपनी 'एफओआईपी' (मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत) की सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहलों से जोड़ा है। ताकाइची के अनुसार, वास्तव में एक स्वतंत्र और खुला क्षेत्र वह नहीं है जहाँ सिर्फ बड़े देशों को आजादी मिले। बल्कि, ऐसा क्षेत्र होना चाहिए जहाँ हर देश बिना किसी बाहरी दबाव के, अपनी इच्छा से अपनी राह चुन सके। उन्होंने भारत को एक बहुत ही जरूरी साझेदार बताया। उन्होंने कहा कि भारत एक समुद्री देश है जिसने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और आसपास के देशों को मजबूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। उनकी बातों से यह साफ होता है कि भारत और जापान की सोच में काफी समानता है।

जापान की एफओआईपी नीति कानून के शासन और समुद्र में आवाजाही की स्वतंत्रता पर जोर देती है। वहीं, भारत की 'महासागर' सोच इसमें विकास के पहलू को भी जोड़ती है। जब ये दोनों पहलें एक साथ आती हैं, तो वे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और हिंद महासागर में उसकी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के मुकाबले एक लोकतांत्रिक विकल्प पेश करती हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र 21वीं सदी का एक बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र बन गया है। दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य गतिविधियां हों या दक्षिण एशिया में बुनियादी ढांचे के जरिए उसका बढ़ता प्रभाव, इन सब से छोटे देशों में चिंता बढ़ी है। अमेरिका जैसा प्रभावशाली देश भी अपनी जिम्मेदारियों और नीतियों को नए हालात के हिसाब से फिर से तय कर रहा है। ऐसे समय में भारत और जापान जैसी मध्यम स्तर की शक्तियों के लिए आगे आने का मौका बनता है।

भारत के लिए 'महासागर' की सोच उसे एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी। इस सोच में सुरक्षा की मजबूती के साथ-साथ सहयोग और भरोसे की ताकत पर भी ध्यान दिया जाएगा। वहीं, जापान के लिए 'एफओआईपी' यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक मूल्य और समुद्री रास्तों की स्वतंत्रता क्षेत्रीय व्यवस्था का एक अहम हिस्सा बने रहें। पूरे ग्लोबल साउथ के लिए 'महासागर' और 'एफओआईपी' चीन पर निर्भरता के बजाय साझेदारी और अपने फैसले खुद लेने का एक विकल्प देते हैं।

भारत और जापान की दोस्ती का इतिहास काफी पुराना है। इसमें सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों की मजबूत भूमिका रही है। हाल के वर्षों में यह रिश्ता और भी मजबूत हुआ है और एक उद्देश्यपूर्ण साझेदारी में बदल गया है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों के संबंधों में एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीआर) जैसी पहलें शामिल हैं। इसके अलावा, रक्षा सहयोग के क्षेत्र में क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) जैसी व्यवस्थाएं भी हैं, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। 'एएजीआर' के तहत भारत और जापान पहले से ही बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी देशों में परियोजनाओं पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

जैसे-जैसे जापान की 'एफओआईपी' और भारत की 'महासागर' सोच एक-दूसरे के करीब आ रही हैं, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग का एक नया रास्ता बन सकता है। यह एक ऐसा रास्ता होगा जिसमें सुरक्षा के साथ-साथ विकास को भी महत्व दिया जाएगा। साथ ही, एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के साथ सभी को साथ लेकर चलने की सोच भी शामिल होगी। अनिश्चितता से भरी आज की दुनिया में भारत को उम्मीद है कि उसकी यह विस्तृत सोच न केवल समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों का भरोसा भी जीतेगी।

प्रधानमंत्री मोदी की 'सागर' और 'महासागर' की पहलें भारत की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं। ये पहलें दर्शाती हैं कि भारत अब सिर्फ अपनी सीमाओं की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। 'सागर' का मतलब था हिंद महासागर में शांति और सुरक्षा, जबकि 'महासागर' का मतलब है कि भारत की सोच अब इससे कहीं आगे बढ़ गई है। यह सोच ग्लोबल साउथ के देशों को सशक्त बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित है।

जापान के साथ साझेदारी इस सोच को और मजबूत करती है। जापान की 'एफओआईपी' नीति भी इसी तरह के सिद्धांतों पर आधारित है - एक स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र। दोनों देशों की यह साझा सोच चीन की बढ़ती क्षेत्रीय शक्ति के सामने एक महत्वपूर्ण संतुलन प्रदान करती है। चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (बीआरआई) और हिंद महासागर में उसकी बढ़ती सैन्य उपस्थिति को अक्सर चिंता की नजर से देखा जाता है। ऐसे में, भारत और जापान की यह साझेदारी एक वैकल्पिक, अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक मॉडल पेश करती है।

'महासागर' की सोच में सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, व्यापार को बढ़ावा देना और पर्यावरण की रक्षा करना भी शामिल है। यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो स्थायी विकास पर जोर देता है। उदाहरण के लिए, एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीआर) के तहत भारत और जापान मिलकर बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और कुछ अफ्रीकी देशों में बुनियादी ढांचे के विकास पर काम कर रहे हैं। यह दिखाता है कि कैसे दोनों देश मिलकर विकास को बढ़ावा दे रहे हैं और स्थानीय समुदायों को सशक्त बना रहे हैं।

प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने अपने लेख में भारत को एक "बेहद जरूरी साझेदार" बताया है। यह दर्शाता है कि जापान भारत की भूमिका को कितना महत्व देता है। उन्होंने कहा कि भारत एक समुद्री देश है जिसने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और आसपास के देशों को मजबूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। यह भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है।

आज की दुनिया में, जहाँ भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है, भारत और जापान जैसी शक्तियों का एक साथ आना महत्वपूर्ण है। यह न केवल उनके अपने हितों की रक्षा करता है, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने में भी मदद करता है। 'महासागर' और 'एफओआईपी' की पहलें ग्लोबल साउथ के देशों को यह विश्वास दिलाती हैं कि उनके पास भी अपनी राह चुनने का अधिकार है और वे किसी एक बड़ी शक्ति पर निर्भर नहीं हैं। यह एक ऐसी दुनिया बनाने की दिशा में एक कदम है जहाँ सभी देश समान रूप से विकसित हो सकें और अपनी संप्रभुता बनाए रख सकें।

भारत की यह विस्तृत समुद्री सोच, जो 'सागर' से 'महासागर' तक फैली है, न केवल समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों का भरोसा भी जीतेगी। यह एक ऐसी भविष्य की ओर इशारा करती है जहाँ सहयोग, पारदर्शिता और आपसी सम्मान के आधार पर एक मजबूत और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र का निर्माण होगा।

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