प्रधानमंत्री मोदी का जापान से गहरा नाता: 1980 के दशक से सांस्कृतिक आदान-प्रदान और मजबूत कूटनीति

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1980
जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के भारत दौरे से दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान से जुड़ाव उनके 2014 में प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले, दशकों पहले से है। मोदी का जापान की संस्कृति, वहां की टेक्नोलॉजी और लोगों के प्रति लगाव बहुत पुराना है। मोदी अर्काइव के एक एक्स पोस्ट के मुताबिक, पीएम मोदी का जापान से पहला व्यक्तिगत संपर्क 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ था। तब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में युवा प्रचारक थे। नेपाल जाते समय उनकी मुलाकात जापान के नागोया शहर के एक युवक से हुई। यह दोस्ती चिट्ठियों के जरिए सालों तक चली। कहा जाता है कि उनके जापानी दोस्त उन्हें जापान के मशहूर ब्रांड के जूते और टी-शर्ट जैसे तोहफे भेजते थे। बदले में पीएम मोदी ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता की एक कॉपी दी थी। कम उम्र में भी वे अंतरराष्ट्रीय दोस्ती को सिर्फ व्यक्तिगत रिश्ता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मेलजोल का जरिया मानते थे।

समय के साथ जापान के प्रति उनका आकर्षण और गहरा होता गया। साल 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर जापान की यात्रा को उन्होंने सिर्फ एक सरकारी दौरा नहीं, बल्कि सीखने का मौका माना। 40 लोगों के दल के साथ उन्होंने टोक्यो, ओसाका, हिरोशिमा और कोबे जैसे शहरों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने मित्सुबिशी, मित्सुई, सुमितोमो, मारुबेनी, सुजुकी, तोशिबा, निप्पॉन स्टील और निसान स्टील जैसी बड़ी जापानी कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इस यात्रा के बाद जापान की निवेश संस्था जेट्रो और गुजरात सरकार के बीच अहम समझौते हुए। इसी यात्रा में पीएम मोदी की मुलाकात जापान के उस समय के उभरते हुए बड़े नेता शिंजो आबे से हुई। दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात आगे चलकर दुनिया की राजनीति में सबसे मजबूत व्यक्तिगत दोस्ती में से एक की शुरुआत बनी। इस मुलाकात को देखने वाले लोगों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच तुरंत एक-दूसरे के प्रति सम्मान और भरोसा पैदा हो गया। बाद के सालों में, जब शिंजो आबे बीमार थे, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नियमित रूप से उनका हालचाल पूछते रहते थे।
जापान में रहते हुए मोदी ने दुनिया भर में मशहूर शिंकानसेन बुलेट ट्रेन में सफर किया। इसी सफर के दौरान उन्होंने भारत में भी बुलेट ट्रेन चलाने का सपना देखा। उन्हें ट्रेन के ड्राइवर की सीट पर बैठने का खास मौका मिला। वहां उन्होंने इंजीनियरों से भूकंप से बचाव की व्यवस्था, समय का प्रबंधन और दूसरी तकनीकी बातों के बारे में विस्तार से जानकारी ली। बाद में यही अनुभव भारत की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं की सोच का हिस्सा बने। बुलेट ट्रेन की यात्रा के दौरान, भाषा की दिक्कत के बावजूद, उन्होंने जापानी बच्चों से बातचीत की और सफर का काफी समय उनके साथ बिताया। टोक्यो के मशहूर सेंसोजी मंदिर में भी उनकी उत्सुकता साफ दिखी। उन्होंने वहां भीड़ को संभालने का तरीका, शहर की योजना और कर्मचारियों के ट्रेनिंग सिस्टम को गहराई से समझा। उनका मकसद यह जानना था कि भारत के बड़े धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में इन तरीकों का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

जापान के एक विश्वविद्यालय में जब उनसे पूछा गया कि भारत और जापान को चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना कैसे करना चाहिए, तो उन्होंने एक खास बात कही। उन्होंने कहा, “अंधकार को तलवार से नहीं हराया जा सकता, एक छोटा-सा दीपक भी अंधकार को दूर कर सकता है।” उनका मानना था कि एक जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर भारत और जापान मिलकर वही रोशनी बन सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना था कि कूटनीति सिर्फ सरकारों के बीच नहीं, बल्कि लोगों के बीच भी मजबूत होनी चाहिए। गुजरात के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान उन्होंने जापान में रहने वाले गुजरातियों से महात्मा मंदिर बनाने के लिए मिट्टी और पानी भेजने की अपील की, ताकि वे भी गुजरात के विकास में अपना योगदान दे सकें। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से अपने जापानी दोस्तों को भारत आने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

कच्छ में आए भयानक भूकंप के बाद जब पुनर्वास का काम चल रहा था, तब उन्होंने जापान के कोबे शहर के भूकंप-रोधी निर्माण मॉडल से प्रेरणा ली। कोबे शहर ने भी खुद एक बड़े भूकंप का सामना किया था। इसी तरह, गुजरात में बच्चों के कुपोषण से निपटने के लिए योजनाएं बनाते समय, उन्होंने अधिकारियों को जापान की मिड-डे मील (दोपहर के भोजन) की व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भी कहा।

साल 2012 में जब पीएम मोदी दोबारा जापान पहुंचे, तो उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर बहुत बड़ा सम्मान मिला। भारत और जापान के राजनयिक संबंधों की 60वीं सालगिरह के मौके पर जापान सरकार ने उन्हें खास तौर पर बुलाया था। पांच दिनों में उन्होंने 40 से ज्यादा कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जो पांच अलग-अलग शहरों में हुए। जापानी अखबार निक्केई ने उन्हें भारत का एक ऐसा नेता बताया जो व्यापार को बढ़ावा देता है। नवरात्रि का व्रत रखते हुए और बहुत व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद, उन्होंने निवेशकों से काफी देर तक बातचीत की। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन के प्रमुख ओसामु सुजुकी के घर पर पारंपरिक जापानी संस्कृति का अनुभव किया। इसके बाद, उन्होंने अचानक सुजुकी के कारखाने का दौरा करने की इच्छा जताई। उन्होंने बताया कि आने वाले वाइब्रेंट गुजरात समिट के लिए गुजरात को जापानी निवेश की जरूरत होगी। इसके बाद, उन्होंने तीन घंटे से ज्यादा समय तक कार बनाने की हर प्रक्रिया को समझा और वहां काम कर रहे भारतीय इंजीनियरों से भी बात की।

जेट्रो बिजनेस फोरम में उन्होंने भारत-जापान आर्थिक सहयोग को लेकर अपना नजरिया साफ किया। उन्होंने कहा, “जापान के पास अनुभव की ताकत है, गुजरात के पास आगे बढ़ने की ताकत है। जापान के पास तकनीक है और गुजरात के पास उसे अपनाने की क्षमता है।” कोबे पोर्ट की यात्रा के दौरान, उन्होंने सिर्फ दूर से देखने के बजाय नाव से परिचालन क्षेत्र का दौरा करने पर जोर दिया। दुनिया के बेहतरीन बंदरगाहों की व्यवस्था देखकर उन्होंने कहा, “एक दिन मैं धोलेरा को भी ऐसा ही बनाऊंगा।”

कई साल बाद जब वह भारत के प्रधानमंत्री बने, तो उनके इन शुरुआती अनुभवों ने भारत-जापान संबंधों को एक नई दिशा दी। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, रक्षा सहयोग, सप्लाई चेन को मजबूत बनाना और तकनीकी साझेदारी जैसे कई अहम क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। इन पहलों की नींव उन अनुभवों और रिश्तों में पहले ही पड़ चुकी थी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशकों पहले जापान के साथ बनाए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान के साथ रिश्ता सिर्फ एक राजनीतिक या आर्थिक साझेदारी नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत जुड़ाव, सांस्कृतिक समझ और भविष्य की सोच का संगम है। 1980 के दशक में एक युवा प्रचारक के तौर पर शुरू हुई यह यात्रा, आज भारत और जापान के बीच मजबूत दोस्ती की मिसाल बन गई है। जापान की संस्कृति, वहां की टेक्नोलॉजी और लोगों के प्रति उनका गहरा लगाव हमेशा से रहा है। यह लगाव उनके हर दौरे और हर फैसले में झलकता है।

जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने जापान की यात्रा को सिर्फ एक सरकारी काम नहीं माना, बल्कि उसे सीखने का एक बड़ा अवसर समझा। उन्होंने टोक्यो, ओसाका, हिरोशिमा और कोबे जैसे शहरों का दौरा किया। वहां उन्होंने बड़ी-बड़ी जापानी कंपनियों के प्रमुखों से मुलाकात की। इस यात्रा का नतीजा यह हुआ कि जापान की निवेश संस्था जेट्रो और गुजरात सरकार के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। इसी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात जापान के एक बड़े नेता शिंजो आबे से हुई। यह मुलाकात इतनी खास थी कि आगे चलकर दोनों देशों के बीच दोस्ती की एक मजबूत मिसाल बनी। दोनों नेताओं के बीच तुरंत एक-दूसरे के प्रति सम्मान और भरोसा पैदा हो गया। यह दोस्ती इतनी गहरी थी कि जब शिंजो आबे बीमार थे, तब भी पीएम मोदी उनसे लगातार हालचाल पूछते रहते थे।

जापान में बुलेट ट्रेन का सफर पीएम मोदी के लिए एक यादगार अनुभव था। उन्होंने न सिर्फ ट्रेन में सफर किया, बल्कि ड्राइवर की सीट पर बैठकर वहां की टेक्नोलॉजी को भी समझा। उन्होंने इंजीनियरों से भूकंप से बचाव की व्यवस्था, समय का प्रबंधन और दूसरी तकनीकी बातों के बारे में जानकारी ली। इसी अनुभव ने उन्हें भारत में बुलेट ट्रेन चलाने के लिए प्रेरित किया। यह भारत की हाई-स्पीड रेल परियोजनाओं की शुरुआत थी। भाषा की रुकावट के बावजूद, उन्होंने जापानी बच्चों से दोस्ती की और उनके साथ समय बिताया। यह दिखाता है कि वे लोगों से जुड़ने में विश्वास रखते थे, चाहे कोई भी भाषा हो।

टोक्यो के सेंसोजी मंदिर में उन्होंने भीड़ प्रबंधन, शहरी नियोजन और कर्मचारियों के ट्रेनिंग सिस्टम को बारीकी से देखा। उनका मकसद यह जानना था कि भारत के बड़े धार्मिक स्थलों को बेहतर तरीके से कैसे चलाया जा सकता है। यह उनकी दूरदर्शिता को दिखाता है कि वे दूसरे देशों की अच्छी बातों को भारत में लागू करना चाहते थे।

जब उनसे जापान के एक विश्वविद्यालय में पूछा गया कि भारत और जापान को चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना कैसे करना चाहिए, तो उन्होंने एक बहुत ही प्रेरणादायक जवाब दिया। उन्होंने कहा, “अंधकार को तलवार से नहीं हराया जा सकता, एक छोटा-सा दीपक भी अंधकार को दूर कर सकता है।” इसका मतलब था कि भारत और जापान मिलकर, अपने साझा लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर, दुनिया में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

पीएम मोदी का मानना था कि दोस्ती सिर्फ सरकारों के बीच नहीं, बल्कि लोगों के बीच भी होनी चाहिए। उन्होंने जापान में रहने वाले गुजरातियों से महात्मा मंदिर बनाने के लिए मिट्टी और पानी भेजने को कहा, ताकि वे भी गुजरात के विकास में भागीदार बन सकें। उन्होंने भारतीय मूल के लोगों को अपने जापानी दोस्तों को भारत आने के लिए भी प्रोत्साहित किया। यह लोगों के बीच संबंध बनाने का एक बेहतरीन तरीका था।

कच्छ में आए भूकंप के बाद, उन्होंने जापान के कोबे शहर के भूकंप-रोधी निर्माण मॉडल से प्रेरणा ली। कोबे शहर ने भी एक बड़े भूकंप का सामना किया था, इसलिए वहां की तकनीक भारत के लिए बहुत उपयोगी थी। इसी तरह, गुजरात में बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए, उन्होंने अधिकारियों को जापान की मिड-डे मील व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भेजा। यह दिखाता है कि वे हर क्षेत्र में जापान से सीखकर भारत को बेहतर बनाना चाहते थे।

साल 2012 में जब पीएम मोदी दोबारा जापान गए, तो उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर बहुत बड़ा सम्मान मिला। भारत और जापान के राजनयिक संबंधों की 60वीं सालगिरह पर जापान सरकार ने उन्हें खास तौर पर बुलाया था। पांच दिनों में उन्होंने 40 से ज्यादा कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। जापानी अखबार निक्केई ने उन्हें भारत का एक ऐसा नेता बताया जो व्यापार को बढ़ावा देता है। नवरात्रि का व्रत रखते हुए भी, उन्होंने निवेशकों से काफी देर तक बातचीत की। यह उनकी मेहनत और लगन को दिखाता है।

उन्होंने सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन के प्रमुख ओसामु सुजुकी के घर पर पारंपरिक जापानी संस्कृति का अनुभव किया। इसके बाद, उन्होंने अचानक सुजुकी के कारखाने का दौरा करने की इच्छा जताई। उन्होंने कार बनाने की हर प्रक्रिया को समझा और वहां काम कर रहे भारतीय इंजीनियरों से भी बात की। उन्होंने कहा, “जापान के पास अनुभव की ताकत है, गुजरात के पास आगे बढ़ने की ताकत है। जापान के पास तकनीक है और गुजरात के पास उसे अपनाने की क्षमता है।” यह भारत और जापान के बीच सहयोग की एक बेहतरीन मिसाल थी।

कोबे पोर्ट की यात्रा के दौरान, उन्होंने दुनिया के बेहतरीन बंदरगाहों की व्यवस्था को देखा। उन्होंने कहा, “एक दिन मैं धोलेरा को भी ऐसा ही बनाऊंगा।” यह उनका सपना था कि भारत के बंदरगाह भी इतने आधुनिक और कुशल हों।

जब वे भारत के प्रधानमंत्री बने, तो उनके इन शुरुआती अनुभवों ने भारत-जापान संबंधों को एक नई दिशा दी। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, रक्षा सहयोग, सप्लाई चेन को मजबूत बनाना और तकनीकी साझेदारी जैसे कई अहम क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। इन सभी पहलों की नींव उन अनुभवों और रिश्तों में पहले ही पड़ चुकी थी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशकों पहले जापान के साथ बनाए थे। यह दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति का दूरदर्शी दृष्टिकोण दो देशों के बीच मजबूत रिश्ते बना सकता है।

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