पन्नालाल घोष: भारतीय शास्त्रीय बांसुरी के अग्रदूत का 24 जुलाई को स्मरण

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नई दिल्ली, 23 जुलाई। भारतीय संगीत के इतिहास में 24 जुलाई का दिन एक ऐसे महान कलाकार को याद करने का है जिन्होंने बांसुरी जैसे साधारण वाद्य यंत्र को शास्त्रीय संगीत के ऊंचे मंच तक पहुंचाया। यह दिन महान बांसुरी वादक और संगीतकार पन्नालाल घोष को समर्पित है, जिन्हें भारतीय शास्त्रीय बांसुरी का जनक माना जाता है। उनकी वजह से बांसुरी सिर्फ लोक धुनों तक सीमित न रहकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एक प्रतिष्ठित एकल वाद्य यंत्र बन गई।

पन्नालाल घोष का जन्म 24 जुलाई 1911 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के बारीसाल में हुआ था, जो आज बांग्लादेश में है। उनका असली नाम अमल ज्योति घोष था, लेकिन दुनिया उन्हें पन्नालाल घोष के नाम से जानती है। उनका परिवार संगीत से गहरा जुड़ा हुआ था। उनके पिता अक्षय कुमार घोष सितार बजाते थे। बचपन से ही घर में संगीत का माहौल था, जिसने उनके जीवन की दिशा तय की। कहा जाता है कि बचपन में ही पन्नालाल घोष बांसुरी की ओर आकर्षित हो गए थे। उन्होंने पहले सितार सीखा, लेकिन बांसुरी की मधुर आवाज ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। उन्हें लगा कि अगर बांसुरी को सही तरीके से विकसित किया जाए, तो यह शास्त्रीय संगीत की जटिलताओं और भावनाओं को भी व्यक्त कर सकती है।
उस समय बांसुरी को मुख्य रूप से एक लोक वाद्य माना जाता था। शास्त्रीय संगीत की गंभीर प्रस्तुतियों के लिए इसे उपयुक्त नहीं समझा जाता था। पन्नालाल घोष ने इस सोच को बदलने का बीड़ा उठाया। उन्होंने बांसुरी के आकार, लंबाई और सुरों की क्षमता पर लगातार प्रयोग किए। उन्हें महसूस हुआ कि छोटी बांसुरी में शास्त्रीय संगीत की गहराई और गंभीर सुरों को पूरी तरह से बजाना मुश्किल है। इसलिए, उन्होंने एक लंबी बांसुरी तैयार की, जिससे गहरे और मधुर सुर निकाले जा सकें। उन्होंने बांसुरी में अतिरिक्त छेद भी जोड़े, जिससे कठिन रागों और मींड जैसी बारीकियों को बजाना संभव हुआ। उनके इन प्रयोगों ने भारतीय बांसुरी वादन की पूरी दिशा ही बदल दी।

पन्नालाल घोष सिर्फ एक बांसुरी वादक ही नहीं, बल्कि एक कुशल संगीतकार भी थे। उन्होंने कई रागों की रचना की, जिनमें ‘दीपावली’ और ‘नूपुरध्वनि’ जैसे राग प्रमुख हैं। उन्होंने फिल्मों के लिए भी संगीत दिया और हिंदी सिनेमा में अपनी एक खास पहचान बनाई। वर्ष 1940 में आई फिल्म ‘स्नेह बंधन’ के लिए उन्होंने स्वतंत्र संगीत निर्देशक के तौर पर काम किया। इसके अलावा, उन्होंने आकाशवाणी से जुड़कर भारतीय संगीत के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने वाद्य वृंद के लिए संगीत तैयार किया और कई युवा कलाकारों को प्रेरित किया।

20 अप्रैल 1960 को पन्नालाल घोष का निधन हो गया, लेकिन उनकी बनाई संगीत की दुनिया आज भी जीवित है। उनके प्रयोगों ने आने वाली पीढ़ियों के बांसुरी वादकों के लिए एक नया रास्ता तैयार किया। आज भारतीय शास्त्रीय बांसुरी की जो पहचान है, उसमें उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। महान बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया जैसे कलाकारों की परंपरा भी उसी मजबूत नींव पर आगे बढ़ी, जिसे पन्नालाल घोष ने तैयार किया था।

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