Mahakal Standard Time New Basis For Time Calculation From Ujjain Proposal By Education Minister Dharmendra Pradhan
महाकाल मानक समय: उज्जैन से समय गणना का नया आधार, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का प्रस्ताव
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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ग्रीनविच मीन टाइम की जगह महाकाल मानक समय अपनाने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा कि उज्जैन समय गणना का मूल केंद्र रहा है और इसे नया आधार बनाया जाना चाहिए। यह सम्मेलन उज्जैन में आयोजित हुआ। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी उज्जैन को विज्ञान नगरी के रूप में विकसित करने की प्रतिबद्धता जताई।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि अब समय आ गया है कि हम ' ग्रीनविच मीन टाइम ' (GMT) की जगह ' महाकाल मानक समय ' (MST) को अपनाएं। उनका मानना है कि मध्यप्रदेश का उज्जैन, जो समय गणना का मूल केंद्र रहा है, इस बदलाव का हकदार है। उन्होंने यह बात उज्जैन में 'महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन' के उद्घाटन के मौके पर कही। यह सम्मेलन तीन दिनों तक चला।
प्रधान ने इस बात पर जोर दिया कि उज्जैन, काशी, कांची और पुरी जैसे भारत के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि 'जीवंत प्रयोगशालाएं' हैं। यहाँ विज्ञान, कला, संस्कृति, साहित्य और अध्यात्म का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि उज्जैन वह खास जगह है जहाँ शून्य देशांतर रेखा (प्राइम मेरीडियन) और कर्क रेखा (ट्रॉपिकल ऑफ कैंसर) मिलती हैं। प्राचीन काल में दुनिया भर में समय की गणना यहीं से होती थी। इसलिए, अब यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि हम 'ग्रीनविच मीन टाइम' की जगह 'महाकाल मानक समय' स्थापित करें। आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उपकरण भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि समय गणना का मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र ही रहा है।शिक्षा मंत्री ने कहा कि भारत के वैज्ञानिक गौरव को दुनिया भर में फिर से स्थापित करने की जरूरत है। इस दिशा में उज्जैन के विज्ञान केंद्र और तारामंडल को मजबूत करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम होगा। प्रधान के अनुसार, उज्जैन एक ऐसी जगह है जहाँ अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी खत्म हो जाती है और एक नई सोच का जन्म होता है। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान, अध्यात्म के बिना अधूरा है।
उन्होंने महाकाल मंदिर की एक पुरानी परंपरा का जिक्र करते हुए बताया कि वैशाख माह के पहले दिन से शिवलिंग पर मिट्टी के बर्तन से लगातार जलाभिषेक किया जाता है। यह सिर्फ एक धार्मिक रिवाज नहीं है, बल्कि गर्मी की चुनौतियों से निपटने और पर्यावरण प्रबंधन की वैज्ञानिक समझ का एक बेहतरीन उदाहरण है। यह दिखाता है कि हमारे समाज में सदियों से समय की गणना करने और प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की वैज्ञानिक समझ रही है। पर्यावरण की जिम्मेदारी और संतुलित जीवनशैली हमेशा से भारतीय ज्ञान परंपरा के केंद्र में रही है।
धर्मेंद्र प्रधान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रटने की बजाय, हमें बच्चों में सृजनात्मकता, सोच को आकार देने और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने की जरूरत है। आज के दौर में, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और वैज्ञानिक सोच का बोलबाला है, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि छात्र पीछे न रह जाएं। इसी को ध्यान में रखते हुए, स्कूलों में AI जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी एक भाषा का ज्ञान किसी पर हावी नहीं हो सकता। इसलिए, शिक्षा को भारतीय भाषाओं और लोक संस्कृतियों से जोड़ा जा रहा है, ताकि छात्र अपनी मातृभाषा में मुश्किल वैज्ञानिक विषयों को भी आसानी से समझ सकें।
इस कार्यक्रम में, धर्मेंद्र प्रधान और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 'विद्यार्थी विज्ञान मंथन' की वेबसाइट, पुस्तिका और विवरण पुस्तिका का भी लोकार्पण किया। इस मौके पर, इस बहु-स्तरीय मूल्यांकन प्रणाली पर आधारित एक वीडियो फिल्म भी दिखाई गई।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से ही समय गणना और खगोल विज्ञान का एक वैश्विक केंद्र रहा है। उन्होंने बताया कि 'सूर्य सिद्धांत' जैसे ग्रंथों के माध्यम से हमारे पूर्वजों ने समय और अंतरिक्ष के बीच गहरे संबंध को स्थापित किया था। उन्होंने दावा किया कि सूर्योदय और सूर्यास्त पर आधारित भारतीय समय मापन प्रणाली, ग्रहों की गति और पृथ्वी के घूर्णन के साथ पूरी तरह से मेल खाती है और 'ग्रीनविच मीन टाइम' से कहीं ज्यादा सटीक है।
मोहन यादव ने इस बात पर जोर दिया कि कर्क रेखा और शून्य देशांतर के संगम के कारण उज्जैन समय गणना का वैश्विक केंद्र रहा है। राज्य सरकार उज्जैन को सिर्फ एक धार्मिक नगरी के रूप में ही नहीं, बल्कि 'विज्ञान नगरी' के रूप में भी विकसित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि 15 करोड़ रुपये की लागत से बने विज्ञान केंद्र का उद्घाटन हो चुका है। साथ ही, सिंहस्थ-2028 के आयोजन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सिंहस्थ दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक मेला है, जिसमें लगभग 35 से 40 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि सिंहस्थ की तैयारियों के तहत, 700 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले बायपास का भूमिपूजन भी किया जा चुका है। इससे उज्जैन के बुनियादी ढांचे में सुधार होगा और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं वाला शहर बनाया जा सकेगा।