Car Sales Amidst Pollution Will We Really Buy Anything
हमें कोई कुछ भी बेच सकता है, प्रदूषण भी
नवभारत टाइम्स•
आज हम बिना सोचे-समझे चीजें खरीद रहे हैं। बाजार हमें बताता है कि हमें क्या चाहिए। कारें, गैजेट्स और अन्य उत्पाद हमारी सुख-सुविधा और पहचान के लिए जरूरी बताए जाते हैं। इससे हम ऐसी चीजें खरीद लेते हैं जिनका उपयोग नहीं होता। यह प्रवृत्ति एक से ज्यादा घर, गाड़ियां और लगातार अपग्रेड करने की चाहत में बदल जाती है।
क्या कार खरीदने का यह 'बेहतरीन वक्त' है? जीएसटी में कटौती और ईयर-एंड डिस्काउंट जैसे आकर्षक ऑफर तब मिल रहे हैं, जब प्रदूषण अपने चरम पर है। इससे पहले फेस्टिव सीजन में गाड़ियों की रिकॉर्ड बिक्री हुई, और ई-कॉमर्स साइट्स पर भी खूब सेल चली। हर घर में कुछ न कुछ पहुंच रहा है। सवाल यह है कि हम इतनी खरीदारी क्यों कर रहे हैं? क्योंकि हमें पता ही नहीं कि हमें असल में चाहिए क्या।
इंडस्ट्री की गलती? हम सब प्रदूषण कम करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर यह ढूंढते हैं कि इसके लिए किसे दोषी ठहराएं। कभी पराली को, कभी निर्माण कार्य को, कभी तंदूर को, कभी डीजल जनरेटर को, तो कभी गाड़ियों को। इन सबमें सच्चाई के अंश हैं, पर कहीं हम एक गहरी समस्या को सतही तौर पर तो नहीं देख रहे? हमें भरोसा दिलाया जाता है कि BS-6 वर्जन से प्रदूषण कम फैलता है। लेकिन जब सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही हो, तो उत्सर्जन मानकों में मामूली सुधार ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है। यहां हर किसी को कार खरीदने के लिए उकसाया जा रहा है, जबकि चीन में कार लॉटरी से मिलती है।इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चमत्कारी समाधान की तरह पेश किया जा रहा है। तकनीकी प्रगति जरूरी है, पर यह विवेक की जगह नहीं ले सकती। शासन और नीतियों में बदलाव अहम हैं, लेकिन सरकारें संस्कारों से भी नियंत्रित होती हैं। इंडस्ट्री को अक्सर जिम्मेदार ठहराया जाता है, पर मांग तो हम उपभोक्ता बनकर पैदा करते हैं।
हम उपभोक्तावाद के ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां हमें खुद नहीं पता कि हमें क्या चाहिए। बाजार हमें बताता है कि हमें क्या चाहिए। एक तरफ ज्यादा से ज्यादा उत्पाद बनाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ हमें यह अहसास कराया जा रहा है कि ये उत्पाद हमारे सुख, पहचान और सामाजिक हैसियत के लिए जरूरी हैं। नतीजतन, हम ऐसी चीजें खरीद लेते हैं, जिनका हम शायद ही कभी उपयोग करते हैं। अपने किचन में झांकिए, वॉर्डरोब में कपड़े देखिए, नया फोन देखिए। यही मानसिकता आगे चलकर जरूरत न होने पर भी एक से ज्यादा घर, गाड़ियां और लगातार अपग्रेड करने की प्रवृत्ति में बदल जाती है। यह सब हमारे भीतर के खालीपन के प्रतीक हैं।
जरूरत या चाहत? कोई कह सकता है कि मांग से अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। पर जरा गहराई से सोचिए, यह लाभ कहीं सिर्फ अरबपतियों को खरबपति तो नहीं बना रहा? बात विकास या सुविधा के खिलाफ नहीं है। असली चुनौती जरूरत और चाहत के बीच फर्क समझने की है। हमारे लिए सबसे जरूरी क्या है? हमारा अस्तित्व, जो अभी दांव पर है। चाहत वह है जो तुलना, ट्रेंड और दिखावे से जन्म लेती है। जब यह फर्क मिट जाता है, तो उपभोग की कोई सीमा नहीं रहती। किसी बंदिश का विरोध देखकर राजनीतिक वर्ग और इंडस्ट्री को लगता है कि हमारे लिए उपभोग बड़ा मुद्दा है, प्रदूषण नहीं। प्रदूषण पर नियंत्रण केवल नियमों, ईंधन या तकनीक से संभव नहीं है। इसके लिए संयम भी चाहिए। हमारी चेतना जागे तो कोई सरकार सो नहीं पाएगी, इंडस्ट्री हमें प्रॉडक्ट की तरह नहीं देख पाएगी।
आजकल कारें खरीदना बहुत आसान हो गया है। जीएसटी में कटौती और साल के अंत में मिलने वाले डिस्काउंट, ये सब मिलकर कार खरीदने का एक शानदार मौका दे रहे हैं। लेकिन यह सब तब हो रहा है जब हवा में प्रदूषण बहुत ज्यादा है। इससे पहले दिवाली जैसे त्योहारों पर गाड़ियों की बिक्री ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। सिर्फ कारें ही नहीं, हर ई-कॉमर्स वेबसाइट पर सेल चल रही है। दिन-रात हमारे घरों में सामान पहुंच रहा है। ऐसा लगता है कि इस समय कोई भी हमें कुछ भी बेच सकता है। ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि हमें खुद ही नहीं पता कि हमें असल में क्या चाहिए।
इंडस्ट्री को दोष देना आसान है। हम सब चाहते हैं कि प्रदूषण कम हो, लेकिन हम यह ढूंढते रहते हैं कि इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए। पहले पराली को निशाना बनाया गया। पराली का मौसम खत्म होते ही प्रदूषण में कमी आ जानी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं हुआ। कभी निर्माण कार्य को दोषी ठहराया जाता है, कभी तंदूर को, कभी डीजल जनरेटर को, तो कभी गाड़ियों को। इन सभी बातों में थोड़ी-थोड़ी सच्चाई है, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि हम एक बहुत बड़ी और मुश्किल समस्या को बहुत ही ऊपरी तौर पर देख रहे हैं?
हमें यह यकीन दिलाया जाता है कि BS-6 वर्जन आ गया है, जिससे प्रदूषण कम फैलता है। लेकिन जब सड़कों पर गाड़ियों की संख्या ही बहुत तेजी से बढ़ रही हो, तो उत्सर्जन मानकों में थोड़ा सा सुधार तो ऐसा है जैसे 'ऊंट के मुंह में जीरा'। यहां हर किसी को कार खरीदने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि चीन जैसे देश में कारें लॉटरी से मिलती हैं।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों को तो ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे वे कोई जादुई समाधान हों। नई तकनीकें जरूरी हैं, लेकिन वे समझदारी की जगह नहीं ले सकतीं। सरकार की नीतियां और उनका काम करने का तरीका बदलना बहुत जरूरी है, लेकिन सरकारें भी लोगों की सोच और आदतों से प्रभावित होती हैं। इंडस्ट्री को अक्सर गलत ठहराया जाता है, लेकिन असल में मांग तो हम उपभोक्ता ही पैदा करते हैं।
हम आज ऐसे समय में जी रहे हैं जिसे उपभोक्तावाद का दौर कहते हैं। इस दौर में हम खुद नहीं जानते कि हमें असल में क्या चाहिए। बाजार हमें बताता है कि हमें क्या चाहिए। एक तरफ कंपनियां लगातार नए-नए उत्पाद बना रही हैं, दूसरी तरफ हमें यह महसूस कराया जा रहा है कि ये उत्पाद हमारी खुशी, हमारी पहचान और हमारे सामाजिक रुतबे के लिए बहुत जरूरी हैं। नतीजा यह होता है कि हम ऐसी चीजें खरीद लेते हैं, जिनका हम शायद ही कभी इस्तेमाल करते हैं। अपने किचन में देखिए, अलमारी में रखे कपड़ों को देखिए, या अपना नया फोन देखिए। यही सोच आगे चलकर हमें तब भी एक से ज्यादा घर, गाड़ियां खरीदने या अपने सामान को लगातार अपग्रेड करने के लिए प्रेरित करती है, जब हमें उनकी जरूरत नहीं होती। यह सब हमारे अंदर के खालीपन को दिखाता है।
जरूरत या चाहत? कोई यह कह सकता है कि ज्यादा मांग होने से अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। लेकिन अगर आप थोड़ा गहराई से सोचें, तो क्या यह फायदा सिर्फ कुछ अमीर लोगों को और अमीर नहीं बना रहा? बात विकास या सुविधा के खिलाफ नहीं है। असली चुनौती यह समझने की है कि हमें किस चीज की जरूरत है और हम किस चीज को सिर्फ चाहते हैं। हमारे लिए सबसे जरूरी क्या है? हमारा अस्तित्व, जो आज खतरे में है। चाहत वह है जो दूसरों को देखकर, फैशन के चक्कर में या दिखावे के लिए पैदा होती है। जब हम जरूरत और चाहत के बीच का फर्क भूल जाते हैं, तो हम बिना सोचे-समझे चीजें खरीदते रहते हैं। जब किसी तरह की रोक-टोक का विरोध होता है, तो राजनेता और इंडस्ट्री को लगता है कि हमारे लिए सामान खरीदना ज्यादा जरूरी है, प्रदूषण नहीं। प्रदूषण को सिर्फ नियमों, ईंधन या नई तकनीक से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए हमें खुद पर भी काबू रखना होगा। अगर हमारी समझ जागे, तो कोई भी सरकार सो नहीं पाएगी और इंडस्ट्री हमें सिर्फ एक ग्राहक की तरह नहीं देखेगी।