खरे नहीं उतरे थे 14 STP, परखी जाएगी UV तकनीक

नवभारत टाइम्स

जल बोर्ड के 14 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के मानकों पर खरे नहीं उतरने के बाद अब यूवी तकनीक की जांच की जाएगी। आईआईटी दिल्ली की टीम यह परखेगी कि गंदे पानी से फेकल कोलीफॉर्म कितना कम हो रहा है। यह तकनीक क्लोरीन से बेहतर मानी जाती है। 37 में से 13 प्लांटों में इसी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है।

14 stps fail uv technology to be tested before releasing water into yamuna
नई दिल्ली: यमुना नदी में पानी का बहाव बनाए रखने के लिए जल बोर्ड के 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों (STPs) से छोड़े जाने वाले साफ पानी की गुणवत्ता पर अब सवाल उठ रहे हैं। इन प्लांट्स में गंदे पानी को साफ करने के लिए इस्तेमाल हो रही यूवी (अल्ट्रा वायलेट) तकनीक की जांच आईआईटी (दिल्ली) के एक्सपर्ट करेंगे। यह पता लगाया जाएगा कि यूवी तकनीक से गंदे पानी में मौजूद फेकल कोलीफॉर्म (मल-मूत्र से होने वाले बैक्टीरिया) कितने प्रतिशत कम हो रहे हैं। साथ ही, यूवी वेवलेंथ, उसकी इंटेंसिटी, एक्सपोजर, टाइमिंग और दूरी जैसी बातों की भी पड़ताल की जाएगी। यह कदम तब उठाया गया है जब दिल्ली पल्यूशन कंट्रोल कमिटी (DPCC) की एक रिपोर्ट में 14 एसटीपी तय मानकों पर फेल पाए गए थे।

जल बोर्ड के अधिकारियों के मुताबिक, इसी साल जुलाई में डीपीसीसी ने जल बोर्ड के 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से निकलने वाले साफ पानी की एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में 23 एसटीपी तो तय मानकों को पूरा करते पाए गए। लेकिन, चिंता की बात यह है कि 14 एसटीपी डीपीसीसी द्वारा निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे। डीपीसीसी ने अपनी जांच में फेकल कोलीफॉर्म की मात्रा भी बताई थी। इसके बाद ही एसटीपी में गंदे पानी को साफ करने के लिए इस्तेमाल की जा रही नई यूवी तकनीक की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो गए।
यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) तक पहुंचा। एनजीटी ने यूवी तकनीक से गंदे पानी को साफ करने की व्यावहारिकता की जांच के लिए आईआईटी, दिल्ली के विशेषज्ञों की एक टीम बनाई है। यूवी तकनीक को गंदे पानी को साफ करने का एक असरदार तरीका माना जाता है। इस तकनीक में यूवी-सी किरणों का इस्तेमाल होता है। ये किरणें पानी में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों के डीएनए को खत्म कर देती हैं, जिससे वे बेअसर हो जाते हैं।

यूवी तकनीक को पानी साफ करने के पुराने क्लोरीन तरीके से ज्यादा सुरक्षित और पर्यावरण के लिए बेहतर माना जाता है। जल बोर्ड के 37 प्लांट्स में से 13 प्लांट्स में इसी यूवी तकनीक का इस्तेमाल करके गंदे पानी को साफ किया जा रहा है। अब आईआईटी की टीम यह सुनिश्चित करेगी कि यह तकनीक वाकई में उतने प्रभावी ढंग से काम कर रही है या नहीं, जितना दावा किया जा रहा है।

यह जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यमुना में पानी का बहाव बनाए रखने के लिए इन प्लांट्स से साफ किए गए पानी पर निर्भर रहना है। अगर पानी पूरी तरह साफ नहीं होगा, तो यमुना का प्रदूषण कम होने की बजाय बढ़ सकता है। फेकल कोलीफॉर्म की मौजूदगी यह बताती है कि पानी में अभी भी मल-मूत्र से जुड़े हानिकारक बैक्टीरिया मौजूद हैं, जो सेहत के लिए खतरनाक हो सकते हैं। आईआईटी की रिपोर्ट के बाद ही यह तय हो पाएगा कि यूवी तकनीक में कोई बदलाव की जरूरत है या नहीं।