समय लेना सही

नवभारत टाइम्स

उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की तारीखें फिर बदली हैं। चुनाव आयोग ने प्रक्रिया के लिए अधिक समय लिया है। बिहार के मुकाबले यूपी में चुनौती बड़ी है। आम लोगों को परेशानी हो रही है। वोटर लिस्ट से नाम कटने का आरोप है। विपक्ष का कहना है कि नागरिकता जांची जा रही है।

special intensive revision sir dates changed again did the election commission make the right decision
उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की तारीखों में एक बार फिर बदलाव किया गया है। चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए खुद को और अधिक समय दिया है। बिहार के पहले चरण के मुकाबले, उत्तर प्रदेश में SIR के सामने चुनौतियां कहीं ज्यादा बड़ी हैं। इस बार की देरी से आम लोगों को भी कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। पहले भी तारीखें बढ़ाई गई थीं। यूपी में ड्राफ्ट रोल 31 दिसंबर को जारी होना था, लेकिन अब यह 6 जनवरी को आएगा। वहीं, फाइनल रोल 6 मार्च 2026 को जारी किया जाएगा। इस दौरान जनता को दावे, आपत्तियां दर्ज कराने और उनके निपटारे का मौका मिलेगा। इससे पहले SIR फॉर्म भरने की तारीख भी बढ़ाई गई थी। तमिलनाडु, गुजरात, एमपी, छत्तीसगढ़, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह जैसे राज्यों को भी ऐसा ही एक्सटेंशन मिला था।

तारीखों में बार-बार हो रहे बदलाव से यह साफ है कि चुनाव आयोग को उम्मीद से कहीं ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बिहार के अनुभव से जो फायदा मिलने की उम्मीद थी, वह पूरी होती नजर नहीं आ रही। लगभग हर दिन इस प्रक्रिया से जुड़ा कोई न कोई विवाद या आरोप सामने आ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ वोटर्स के नाम ड्राफ्ट रोल से काटे जा सकते हैं। यह आंकड़ा बहुत बड़ा है। बिहार में पहले ड्राफ्ट रोल में ही 65 लाख मतदाता कम थे। विपक्ष का आरोप है कि वोटर लिस्ट रिवीजन के नाम पर नागरिकता जांची जा रही है और योग्य मतदाता भी अपना नाम दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। इस तरह की शिकायतों को सिर्फ राजनीतिक आरोप मानकर खारिज करना सही नहीं होगा। अगर लाखों लोगों ने फॉर्म भरकर नहीं लौटाए हैं, तो इसके पीछे की वजह का पता लगाना भी जरूरी है।
SIR इस समय राजनीतिक टकराव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है, खासकर पश्चिम बंगाल में। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि SIR की वजह से 60 लोगों की मौत हो चुकी है। दो दिन पहले ही एक बुजुर्ग ने चुनाव आयोग के सामने सुनवाई से पहले आत्महत्या कर ली। बीएलओ (BLO - Booth Level Officer) की मौत और आत्महत्या के भी कई मामले सामने आए हैं। अगर किसी प्रक्रिया की वजह से आम लोगों में इतना डर और दबाव पैदा हो जाए कि वे मौत का रास्ता चुनने लगें, तो यह साफ संकेत है कि इसमें सुधार की सख्त जरूरत है।

SIR का मुख्य उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पर्व में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई भी नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे। अगर इस प्रक्रिया में थोड़ा और समय लगता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी तरह के भेदभाव या गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे। लोगों का विश्वास बनाए रखना और उन्हें वोट देने के लिए प्रेरित करना ही SIR का असली लक्ष्य होना चाहिए। यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग का काम है कि लोग वोट देने से न चूकें। अगर इसमें और समय लगता है, तो कोई बात नहीं।