जैमर और प्रोग्रामर से चुरा डालीं 200 से अधिक कारें

नवभारत टाइम्स

नोएडा पुलिस ने एक बड़े वाहन चोर गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस गिरोह ने जैमर और प्रोग्रामर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल कर 200 से अधिक कारें चुराई थीं। पुलिस ने गिरोह के सरगना सहित छह सदस्यों को गिरफ्तार किया है। इनके पास से चोरी की तीन कारें और अत्याधुनिक उपकरण बरामद हुए हैं।

gang that stole over 200 cars using jammers and programmers arrested
नोएडा पुलिस ने एक ऐसे अंतरराज्यीय वाहन चोर गिरोह का पर्दाफाश किया है जो 11 सालों से सक्रिय था और 200 से ज्यादा लग्जरी और सामान्य कारें चुरा चुका था। इस गिरोह के सरगना समेत छह सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है। उनके पास से चोरी की तीन कारें और वाहन चोरी में इस्तेमाल होने वाले खास इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बरामद हुए हैं। यह गिरोह दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सक्रिय था और चोरी की गई गाड़ियों को राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में ऊंचे दामों पर बेचता था।

सेक्टर-39 पुलिस ने इस बड़ी कामयाबी को अंजाम दिया है। गिरफ्तार किए गए गिरोह के सरगना समीर उर्फ दाऊद पर दिल्ली-नोएडा में 14 मामले दर्ज हैं। वह साल 2013 से अपराध की दुनिया में सक्रिय था। वहीं, आरोपी आजाद पर अलग-अलग राज्यों में 38 मुकदमे और सलीम पर 7 मामले दर्ज हैं। पुलिस ने इनके पास से चोरी की तीन कारें, दो फर्जी नंबर प्लेट, 6 टी-लॉक ब्रेकर, की-प्रोग्रामर, जीपीएस जैमर, वायर कटर और नकली चाबियों का पूरा किट बरामद किया है। इस शानदार काम के लिए डीसीपी नोएडा ने सेक्टर-39 पुलिस टीम को 25 हजार रुपये के नकद इनाम की घोषणा की है। सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया है।
इस गिरोह की काम करने का तरीका बहुत ही सुनियोजित था। वे दिन में अपनी सलेटी हुण्डई कार से सोसायटियों, कंपनियों और सड़कों के किनारे खड़ी गाड़ियों की रेकी करते थे। यानी, वे पहले देखते थे कि कौन सी गाड़ी कब और कहां खड़ी है। रात में जब वे चोरी करने निकलते थे, तो गिरोह का एक सदस्य थोड़ी दूर खड़ा होकर पहरा देता था। जैसे ही वे गाड़ी चुराते थे, तुरंत उसमें जीपीएस जैमर लगा देते थे। यह एक ऐसा डिवाइस होता है जो गाड़ी के जीपीएस सिस्टम को ब्लॉक कर देता है। इससे पुलिस या गाड़ी का मालिक गाड़ी की लोकेशन का पता नहीं लगा पाता था।

यह गिरोह सिर्फ गाड़ियां चुराता ही नहीं था, बल्कि मांग पर भी गाड़ियां सप्लाई करता था। यानी, अगर किसी को कोई खास गाड़ी चाहिए होती थी, तो वे उसे चुराकर पहुंचा देते थे। चोरी की गई गाड़ियों को राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में अच्छी कीमत पर बेच दिया जाता था। पुलिस से बचने के लिए वे सीधे रास्तों की बजाय सुनसान रास्तों का इस्तेमाल करते थे। गाड़ी चुराने के तुरंत बाद वे उस पर फर्जी नंबर प्लेट लगा देते थे, ताकि गाड़ी की पहचान न हो सके। जो गाड़ियां बिक नहीं पाती थीं, उन्हें काटकर उनके पुर्जे अलग कर दिए जाते थे। इन पुर्जों को दिल्ली के अलग-अलग ऑटो पार्ट्स बाजारों में बेच दिया जाता था। इस तरह, यह गिरोह चोरी, सप्लाई और पुर्जे बेचने का पूरा रैकेट चला रहा था।